Monday, 24 August 2015

यहां कभी रावण करता था पूजा, दैत्य गुरू ने 8 हजार साल तक की थी तपस्या

सावन के मौके पर यूं तो हर शिव मंदिर में शिवभक्तों की भीड़ दिखाई देती है, लेकिन बदायूं-शाहजहांपुर के बॉर्डर पर स्थित देवकली मंदिर में भक्‍तों की भीड़ का नजारा देखते ही बनता है। पौराणिक महत्व होने के कारण यहां ज्‍यादा शिवभक्त पहुंचते हैं। इस शिव मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां कई बार शिवभक्त रावण खुद पूजा करने आ चुका है।

कहा जाता है कि सतयुग के चौथे चरण में दैत्य गुरु शुक्राचार्य इस स्थान पर आए थे। उन्होंने संजीवनी विद्या हासिल करने के लिए यहां तपस्या की थी। सालों तक तपस्या करने के बाद भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए। भगवान शिव ने शुक्राचार्य से कहा था कि जब वो यहां पर आठ शिवलिंग की स्थापना करेंगे तभी उन्‍हें संजीवनी विद्या प्राप्त होगी।

शुक्राचार्य ने की 8 हजार साल तक तपस्या
पुजारी अखिलेश गिरी गोस्वामी बताते हैं कि अमूमन किसी भी शिवमंदिर में एक शिवलिंग होता है, लेकिन पटना देवकली मंदिर में शुक्राचार्य ने आठ हजार सालों तक तपस्या कर संजीवनी विद्या हासिल की थी। इन आठ हजार सालों में उन्होंने सर्व, रूद्र, उग्र, भीमा, पशुपति, इशा नकशा, महादेव और राम नाम के आठ शिवलिंगों की स्थापना की। पुजारी कहते हैं कि प्राचीन समय में मंदिर के पास से होकर गंगा निकलती थीं। समय के साथ-साथ वो भी विलुप्त होती चली गई। इसे अगहर भी कहते हैं।
खुदाई में निकले राख से भरे हवनकुंड
सरोवरनुमा रह जाने से इसे शुक्र काशी के नाम से जाना जाने लगा। बताया जाता है कि ये झील चर्म रोगियों के लिए वरदान साबित होती थी। करीब दस साल पहले ये लुप्त हो गई। लगभग तीन साल पहले मंदिर का सौंदर्यीकरण कराने के लिए मंदिर की खुदाई की गई थी। खुदाई में करीब 11 फिट नीचे दो हवनकुंड निकले। इसमें राख भरी हुई थी। उस राख को लेने के लिए भक्‍तों की भीड़ लग गई। बाद में डीएम ने अपनी मौजूदगी में राख को बंटवाया था। यही नहीं खुदाई में मिले ईंटों को जब तोड़ा गया, तो उसमे छोटे-छोटे शिवलिंग मिले थे।
मंदिर पर बुरी नजर डालने वाला हो गया तबाह
पुजारी अखिलेश गिरी गोस्वामी ने जब भी मंदिर पर किसी ने बुरी नजर डाली, उस पर संकट जरूर आया है। उन्होंने साल 1969 के एक वाक्‍ये के बारे में बताया कि उस साल एक दबंग व्यक्ति ने मंदिर में डाका डलवाया था। उस व्‍यक्ति को मंदिर के पुजारी के पिता और दादी ने पहचान लिया था। जांच के लिए आए तत्कालीन दरोगा को जब कामयाबी नहीं मिली, तो उन्होंने मंदिर में अर्जी लगा दी। इसके बाद से ही बदमाश परेशान रहने लगा। हालत ये हो गए कि बदमाश की मां ने अपने बेटे की काली करतूत के बारे में सबको खुद बताया।

बंदरों से घिरा रहता है पूरा मंदिर
इस शिव मंदिर में बंदरों की फौज हमेशा रहती है। कभी-कभी ये भक्तों के लिए आफत भी साबित होते हैं। पुजारी अखिलेश कहते हैं कि करीब दस साल पहले यहां बंदरों की फौज इकठ्ठा हुई थी। तब से लेकर आज तक ये यहां से नहीं गए हैं।

 
इस मंदिर में मुस्लिम भी झुकाते हैं सिर
इस मंदिर में सौहार्द भी देखने को मिलता है। पुजारी के मुताबिक, यहां मुस्लिम भी सिर झुकाते हैं। मंदिर के विस्तार के लिए बहुत समय पहले फकीर मोहम्मद शाह ने जमीन मंदिर के लिए दान की थी। इसी के बाद से मुस्लिम यहां अपने बच्चों का मुंडन भी करवाते हैं।
दो दिन पहले से शुरू हो जाती है तैयारियां
पुजारी अखिलेश ने बताया कि सावन के महीने में यहां भक्तों की काफी भीड़ देखने को मिलती है। महाशिवरात्रि पर दो दिन पहले से ही तैयारियां होना शुरू हो जाती हैं। बेल पत्र, धतूरा, बेर आदि की दुकानें लगने लगती हैं। भक्तों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पुलिस फोर्स भी तैनात की जाती है। 

भद्रा काल खत्म होने के बाद बांधे राखी, भाइयों को मिलता है शुभ फल

वैदिक काल से श्रावणी पूर्णिमा को भाई-बहन का पावन पर्व रक्षा बंधन मनाया जा रहा है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उनकी रक्षा करने का वचन देता है। वहीं, रक्षा बंधन के दिन भद्रा काल के बाद ही राखी बांधनी चाहिए। इस बार ये भद्रा काल 1 बजकर 50 मिनट पर खत्म हो रहा है। ऐसे में राखी बांधने के लिए इसके बाद का ही समय शुभ है।
पुराणों के अनुसार, सबसे पहले देवगुरु बृहस्पति ने इंद्र को रक्षा सूत्र बांधा था। इसके बाद हर साल इंद्र को इंद्राणी भी रक्षा सूत्र बांधने लगीं। तब से लेकर आज तक ये त्यौहार मनाया जाता है। तभी से ये त्यौहार आज भी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। डॉ. शक्तिधर शर्मा के अनुसार, भद्रा का विचार रक्षा बंधन के समय अवश्य करना चाहिए।
भद्रा काल खत्म होने के बाद बांधे राखी
रक्षा बंधन के दिन भद्रा काल के बाद ही राखी बांधना शुभ होगा। इस बार भद्रा काल 29 अगस्त को 1 बजकर 50 मिनट पर समाप्त हो रहा है। ऐसे में इसके बाद ही भाई को राखी बांधना बेहतर होगा। डॉ. पंडित शक्तिधर शर्मा के अनुसार 'भद्रा' यमराज की बहन है और भद्रा के मुखकाल में भाई की रक्षा के लिए किया गया कार्य शुभ फल प्रदान नहीं करेगा। अच्छा यही होगा कि पुच्छ काल अथवा भद्रा रहित काल में रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाए।
पति-पत्नी के लिए था पर्व
डॉ. पंडित शक्तिधर शर्मा (शास्त्री) के मुताबिक, शुरुआत में ये त्यौहार पति-पत्नी के पवित्र प्रेम का बंधन था। युद्ध में जाते समय शची ने इंद्र को और प्रमिला (सुलोचना) ने मेघनाद को रक्षासूत्र बांधा था। मेघनाद की मृत्यु के बाद ये भाई-बहन का पर्व बन गया। ऐसा माना जाता है कि प्रमिला ने भद्रा के मुखकाल में राखी बांधी थी। इस वजह से इसका प्रभाव नहीं हुआ और मेघनाद युद्ध में मारा गया। शुरुआत में राजा बलि को उनकी बहन लक्ष्मी ने रक्षा सूत्र बांधकर विष्णु से मुक्त कराया था।
कर्क राशि में होता है सूर्य
श्रावणी पर्व के दिन गृहस्थी और वानप्रस्थी दोनों को इस दिन किए जाने वाले उपाकर्म और श्रावणी कर्म करने चाहिए। मान्यता है कि इस दिन गोबर, मिट्टी, मुल्तानी मिट्टी, यज्ञ भस्म आदि का लेप करके स्नान करना चाहिए। इससे त्वचा के रोगों का विनाश होता है। डॉ. पंडित शक्तिधर शर्मा ने बताया कि कर्क राशि में सूर्य होने के कारण आसमान में बादल छाए रहते हैं। इस वजह से उसकी किरणें पृथ्वी पर नहीं पहुंचती, जिससे कई तरह की बीमारियां और संक्रमण होने का खतरा रहता है। इनसे बचने के लिए ही श्रावणी कर्म किए जाते हैं।
श्रावणी कर्म करने से खत्म होते हैं रोग
डॉ. शक्तिधर शर्मा कहते हैं कि सनातन धर्म में जितने पर्व हैं, वे इंसान बेहतर स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए है। साथ ही एक-दूसरे में परस्पर प्रेम बनाए रखने के लिए आयोजित किए जाते हैं। इसलिए भविष्य पुराण में बताया गया है कि सभी रोगों का विनाशक है श्रावणी कर्म।
सावन के महीने में किए जाते हैं ये कर्म
1. तत्तद्स्नान
2. सूर्य अराधना
3. प्राणायाम
4. अग्निहोम
5. ब्रह्मर्षि पूजन

भारत के इस आइलैंड पर जाने वाले नहीं लौट पाते हैं वापस



इस आधुनिक जीवन में आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जिनके पास न बिजली है, न सड़क है, न इंटरनेट। यहां तक की इनका किसी सिविलाइजेशन से कोई ताल्लुक भी नहीं है। भारत के अधिकार क्षेत्र में आने वाला सेंटिनल आइलैंड एक ऐसी ही जगह है। यहां रहने वाली सेंटिनलीज जनजाति का आधुनिक मानव सभ्यता से कोई लेना-देना नहीं है। बहुत बार इसको आधुनिक समाज से जोड़ने का प्रयास किया गया, लेकिन इस जनजाति के लोग इतने ज्यादा आक्रामक हैं कि वे किसी को अपने पास आने ही नहीं देते।
कुछ मामलों में इक्का-दुक्का लोगों ने उन तक पहुंचने का प्रयास किया तो इन लोगों ने उन्हें मार दिया। एक भागा हुआ कैदी गलती से इस आइलैंड पर पहुंचा तो उसे भी मार दिया। सन् 1981 में एक भटकी हुई नौका इस आइलैंड के करीब पहुंची थी। उसके मेंबर्स ने बताया कि कुछ लोग किनारों पर तीर-कमान और भाले लेकर खड़े थे। हमारी किस्मत अच्छी थी कि हम वहां से निकलने में सफल रहे।
2004 में आए भूकंप और सुनामी के बाद भारत सरकार ने इस आइलैंड की खबर लेने के लिए सेना का एक हेलिकॉप्टर भेजा था। लेकिन यहां के लोगों ने उस पर भी हमला कर दिया। हवाई तस्वीरों से यह साफ होता है कि ये जनजाति खेती नहीं करती, क्योंकि इस पूरे इलाके में अब भी घने जंगल हैं। इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि यह जनजाति शिकार पर निर्भर है। बहुत से लोगों का मानना है कि इस जनजाति तक पहुंच बनाई जानी चाहिए। वहीं, कुछ मानते हैं कि उन्हें अपने हाल पर छोड़ देना ही ठीक है।

वर्ल्ड के 10 लंबे रेलवे प्लैटफॉर्म्स में इंडिया के 6, विकीपीडिया ने जारी की लिस्ट

दुनिया की टॉप वेबसाइट्स में शुमार विकीपीडिया ने वर्ल्ड के टॉप-10 प्लैटफॉर्म्स की लिस्ट जारी की है। इसमें इंडिया के 6 शहरों के प्लैटफॉर्म्स को जगह मिली है। पहले नंबर पर जहां गोरखपुर का रेलवे स्टेशन है तो वहीं दूसरे नंबर पर केरल के कोलम स्टेशन को शामिल किया गया है। तीसरे नंबर पर भी इंडिया का ही कब्जा है। पश्चिम बंगाल के खड़गपुर स्टेशन को विकीपीडिया ने तीसरे पायदान पर रखा है। पांचवें नंबर पर छत्तीसगढ़ का बिलासपुर स्टेशन है। वहीं, सातवें नंबर पर झांसी रेलवे प्लैटफॉर्म को चुना गया है और दसवें नंबर पर बिहार का सोनपुर रेलवे प्लैटफॉर्म है।
टॉप-10 लिस्ट में शुमार इंडिया के रेलवे प्लैटफॉर्म्स
रेलवे प्लैटफॉर्म लंबाई
गोरखपुर 4483 फीट ( 1366.33 मीटर)
कोलम 3873 फीट (1180.5 मीटर)
खड़गपुर 3518 फीट (1072.5 मीटर)
बिलासपुर 2631 फीट ( 802 मीटर)
झांसी 2526 फीट (770 मीटर)
सोनपुर 2421 फीट (738 मीटर)

यूएस, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के भी प्लैटफॉर्म्स शामिल
विकीपीडिया द्वारा जारी की गई लिस्ट में इंडिया के इन 6 लंबे रेलवे प्लैटफॉर्म्स के अलावा चार प्लैटफॉर्म्स यूएस, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के हैं। यूएस के शिकागो का स्ट्रेट स्ट्रीट सब-वे रेलवे प्लैटफॉर्म चौथे नंबर पर है। इसकी लंबाई 3501 फीट (1067 मीटर) है। वहीं छठे नंबर पर ब्रिटेन के सेरेटन का शटल टर्मिनल फोकस्टोन है। इसकी लंबाई 2595 फीट ( 791 मीटर) है। इसे यूरोप का सबसे लंबा स्टेशन घोषित किया जा चुका है। आठवें नंबर पर ऑस्ट्रेलिया के पर्थ का ईस्ट पर्थ रेलवे स्टेशन है। ये 2526 फीट (770 मीटर) लंबा है। इसे ऑस्ट्रेलिया का सबसे लंबा स्टेशन माना जाता है। वहीं नौवें नंबर पर वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया का कैलगूर्ली रेलवे प्लैटफॉर्म है। ये 2493 फीट (760 मीटर) लंबा है।

Wednesday, 22 July 2015

आज भी राज ही बनी हैं ये 10 रहस्यमयी पहेलियां!

दुनियाभर में बहुत सारी जगहें ऐसी जो रहस्यों से भरी पड़ी हैं, जिस पर से कोई पर्दा उठा ही नहीं पाया। हालांकि ऐसे लोगों की भी कमी नहीं हैं जो अंधविश्वास और आंखें मूंदकर रहस्यों पर विश्वास कर लेते हैं। भारत में भी ऐसी बहुत सारे रहस्यमयी जगहें है जो सिर्फ रहस्य बन कर ही रह गई हैं।
यहां हम कुछ ऐसे रहस्यों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनके बारे में जानने के बाद आपको उन पर यकीन करना मुश्किल हो जाएगा।
1.एक जुड़वांओं का गांव
भारत गांव का देश कहा जाता है। वहीं केरल के कोडिन्ही गांव में सबसे ज़्यादा जुड़वां लोग बसते हैं। यहां लगभग 2000 परिवार रहते हैं उनमें से 250 जुड़वां हैं। यहां लगातार गांव में जुड़वां बच्चे पैदा होते चले जा रहे हैं। अभी तक इसके पीछे कोई वाजिब कारण सामने नहीं आया।
2. जोधपुर धमाका
18 दिसंबर 2012 के दिन जोधपुर के लोगों को एक धमाका सुनाई दिया। इसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि मानो कान फट जाए। लोगों ने सोचा कि शायद आसमान में कोई जहाज टकरा गया है, लेकिन देखने पर ऐसा कुछ नहीं था। आसमान खाली था। वो धमाका आज भी रहस्य की एक वजह बना हुआ है।
3.नौ अज्ञात पुरुष (The Nine Unknown Men)
वैसे ये रहस्य पश्चिम देशों से आया था। लोगों का मानना है कि ये शक्तिशाली रहस्य सम्राट अशोक के समय में भारत आया। जब सम्राट अशोक का युद्ध चल रहा था तो इनका काम (Nine Unknown Men) सारी रहस्यों को महफ़ूज़ रखना था। इनके पास एक ज्ञान की किताब हुआ करती थी लेकिन इसमें से कुछ बातें लीक हो गईं। और कहा जाता है कि जुडो इसी किताब की देन है।
4.ताज महल का रहस्य
 मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी बेग़म मुमताज के लिए ताज महल बनवाया था इसलिए उसे ताजमहल कहा जाता है लेकिन दिल्ली के प्रोफेसर पी.एन. ऑक का कहना है कि दरअसल ताज महल एक शिव मंदिर था जिसका नाम तेजू महोलिया हुआ करता था। अगर ये सच है तो इतिहास की किताबों से बहुत सारी बातें मिट जाएगी और कुछ नई जानकारियां जुड़ जाएगी।
5.एक शापित गांव (कुलधारा)
500 साल पहले इस गांव की आबादी लगभग 1500 हुआ करती थी लेकिन एक रात सब लोग अचानक कहीं गायब हो गए। सब का सब वैसे का वैसा छोड़कर। लोगों का कहना है कि यहां एक लड़का-लड़की आपस में प्यार करते थे लेकिन लड़की के गुस्सैल पिता ने लड़के को मार दिया। उसके बाद से ही कहा जाता है कि इस गांव में कोई नहीं बस सका। लोगों का कहना है कि यहां बहुत सी खतरनाक घटनाएं घटती रहती हैं।
6. मैगनेटिक हिल (The Magnetic Hill)
हिमालय की पहाड़ियों के पास और लद्दाख की वादियों में एक ऐसी जगह है, जहां अगर आपने गाड़ी खड़ी कर दी तो वो अपने आप ही पीछे को खिंची चली आती है। लोग इसे हिमालय का जादू कहकर बुलाते हैं।
7.हिमालय में रहने वाले अमर लोग लोगों का मानना है कि बहुत से साधु-महात्मा हिमालय में जाकर तपस्या कर रहे हैं और जो उसे सिद्ध कर लेता है, उसे अमर होने से कोई नहीं रोक सकता। अभी तक ये रहस्य बना हुआ है कि कितने लोगों के ज्ञानचक्षु खुल चुके हैं और वो अमरता की राह को पा चुके हैं।
8.एक भूत बिल्ली
इसका आतंक एक बार पूना के आस-पास छाया था। लोग रात को डरने लग गए थे। एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि उसकी काली-काली आंखें बड़ी ही डरावनी थीं और उसकी छलांग तो बहुत ही लंबी थी हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि ये एक अफ़वाह थी लेकिन रहस्य अभी भी बना हुआ है।
9.The Kongka La Pass UFO Base
भारत और चीन के बोर्डर पर ये पास है। दोनों देशों के बीच टकराव की वजह कभी ये क्षेत्र भी रह चुका है लेकिन UFO ने अपना बेस बनाने के लिए इस जगह को चुना. ऐसा कुछ लोगों का कहना है, कि यहां कोई आम आदमी नहीं जा सकता इसीलिए स्थानीय लोगों को शक है कि कहीं ये सच न हो।
10.शांति देवी
इनका जन्म 1930 को दिल्ली के एक परिवार में हुआ। 4 साल की उम्र में वो अपने माता-पिता को अपने असली मम्मी-पापा मानने से इनकार करने लगी और कहने लगी कि उसका असली नाम लुग्डी है। वो पिछले जन्म में डिलीवरी के दौरान मर गई थी। जब उनके मम्मी-पापा ने बात की जांच करवाई तो सब हैरान रह गए। वो सब सच था।

Saturday, 4 July 2015

D'Anniv: एक वेश्या ने कराया था विवेकानंद को संन्यासी होने का अहसास

स्वामी विवेकानंद की आज 113वीं पुण्यतिथि है। स्वामी जी ने शिकागो की धर्म संसद में भाषण देकर दुनिया को ये एहसास कराया कि भारत विश्व गुरु है। अमेरिका जाने से पहले स्वामी विवेकानंद जयपुर के एक महाराजा के महल में रुके थे। यहां एक वेश्या ने उन्हें एहसास कराया कि वह एक संन्यासी हैं।
स्वामी के स्वागत को बुलाई गई थी वेश्या
राजा विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस का भक्त था। विवेकानंद के स्वागत के लिए राजा ने एक भव्य आयोजन किया। इसमें वेश्याओं को भी बुलाया गया। शायद राजा यह भूल गया कि वेश्याओं के जरिए एक संन्यासी का स्वागत करना ठीक नहीं है। विवेकानंद उस वक्त अपरिपक्‍व थे। वे अभी पूरे संन्‍यासी नहीं बने थे। वह अपनी कामवासना और हर चीज दबा रहे थे। जब उन्‍होंने वेश्‍याओं को देखा तो अपना कमरा बंद कर लिया। जब महाराजा को गलती का अहसास हुआ तो उन्होंने विवेकानंद से माफी मांगी।
कमरे में बंद हो गए थे स्वामी जी
महाराजा ने कहा कि उन्होंने वेश्या को इसके पैसे दे दिए हैं, लेकिन ये देश की सबसे बड़ी वेश्या है, अगर इसे ऐसे चले जाने को कहेंगे तो उसका अपमान होगा। आप कृपा करके बाहर आएं। विवेकानंद कमरे से बाहर आने में डर रहे थे। इतने में वेश्या ने गाना गाना शुरू किया, फिर उसने एक सन्यासी गीत गाया। गीत बहुत सुंदर था। गीत का अर्थ था- ''मुझे मालूम है कि मैं तुम्‍हारे योग्‍य नहीं, तो भी तुम तो जरा ज्‍यादा करूणामय हो सकते थे। मैं राह की धूल सही, यह मालूम मुझे। लेकिन तुम्‍हें तो मेरे प्रति इतना विरोधात्‍मक नहीं होना चाहिए। मैं कुछ नहीं हूं। मैं कुछ नहीं हूं। मैं अज्ञानी हूं। एक पापी हूं। पर तुम तो पवित्र आत्‍मा हो। तो क्‍यों मुझसे भयभीत हो तुम?''
डायरी में लिखा था- मैं हार गया हूं
विवेकानंद ने अपने कमरे इस गीत को सुना, वेश्‍या रोते हुए गा रही थी। उन्होंने उसकी स्थिति का अनुभव किया और सोचा कि वो क्या कर रहे हैं। विवेकानंद से रहा नहीं गया और उन्होंने कमरे का गेट खोल दिया। विवेकानंद एक वेश्या से पराजित हो गए। वो बाहर आकर बैठ गए। फिर उन्होंने डायरी में लिखा, ''ईश्‍वर से एक नया प्रकाश मिला है मुझे। डरा हुआ था मैं। जरूर कोई लालसा रही होगी मेरे भीतर। इसीलिए डर गया मैं। किंतु उस औरत ने मुझे पूरी तरह हरा दिया। मैंने कभी नहीं देखी ऐसी विशुद्ध आत्‍मा।'' उस रात उन्‍होंने अपनी डायरी में लिखा, ''अब मैं उस औरत के साथ बिस्‍तर में सो भी सकता था और कोई डर नहीं होता।''
सीख- इस घटना से विवेकानंद को तटस्थ रहने का ज्ञान मिला, आपका मन दुर्बल और निसहाय है। इसलिए कोई दृष्‍टि कोण पहले से तय मत करो।
सत्य का साथ कभी मत छोड़ो
प्रसंग- स्वामी विवेकानंद एक मेधावी छात्र थे। उनके सभी साथी स्वामी जी की पर्सनेलिटी के कायल थे। जब भी वह साथियों को कुछ सुनाते, सब बड़े ध्यान से उन्हें सुनते थे। एक दिन स्कूल की क्लास में वह साथियों को कहानी सुना रहे थे। तभी मास्टर जी क्लास में आ गए और किसी तो पता भी नहीं चला। मास्टर जी गुस्से में आ गए और स्टूडेंट्स से सवाल करने लगे। पूरी क्लास में सिर्फ विवेकानंद ने ही सवाल का सही उत्तर दिया। टीचर ने स्वामी जी को छोड़कर बाकी स्टूडेंट्स को बेंच पर खड़ा कर दिया। स्वामी जी जानते थे कि मेरे कारण ही साथियों को सजा मिल रही है। वह सही उत्तर देने के बाद भी बेंच पर खड़े हो गए। उन्होंने टीचर से कहा, ''मैं खुद ही अपने सभी साथियों को कहानी सुना रहा था। सजा मुझे भी मिलनी चाहिए।''
सीख- किसी भी स्थिति में सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। सत्य में वह ताकत है जिससे किसी का भी दिल जीता जा सकता है
 केवल लक्ष्य पर ध्यान लगाओ
प्रसंग- स्वामी विवेकानंद अमेरिका में एक पुल से गुजर रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि कुछ लड़के नदी में तैर रहे अंडे के छिलकों पर बन्दूक से निशाना लगा रहे थे। किसी भी लड़के का एक भी निशाना सही नहीं लग रहा था। स्वामी जी ने खुद बन्दूक संभाली और निशाना लगाने लगे। उन्होंने एक के बाद एक 12 सटीक निशाने लगाए। सभी लड़के दंग रह गए और उनसे पुछा- स्वामी जी, आप ये सब कैसे कर लेते हैं? इस पर स्वामी विवेकानंद ने कहा, ''जो भी काम करो अपना पूरा ध्यान उसी में लगाओ।''
सीख- जो काम करो, उसी में अपना पूरा ध्यान लगाओ। लक्ष्य बनाओ और उन्हें पाने के लिए प्रयास करो। सफलता हमेशा तुम्हारे कदम चूमेगी। 
 
मुसीबत से डर कर भागो मत, उसका सामना करो
प्रसंग- स्वामी विवेकनन्द एक बार बनारस में मां दुर्गा के मंदिर से लौट रहे थे, तभी बंदरों के एक झुंड ने उन्हें घेर लिया। बंदरों ने उनसे प्रसाद छिनने कोशिश की, स्वामी जी डर के मारे भागने लगे। इसके बाद भी बंदरों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। तभी पास खड़े एक बुजुर्ग सन्यासी ने विवेकानंद से कहा- रुको! डरो मत, उनका सामना करो और देखो क्या होता है। संन्यासी की बात मानकर वह फौरन पलटे और बंदरों की तरफ बढ़ने लगे। इसके बाद सभी बंदर एक-एक कर वहां से भाग निकले।
सीख- इस घटना से स्वामी जी को एक गंभीर सीख मिली। अगर तुम किसी चीज से डर गए हो, तो उससे भागो मत, पलटो और सामना करो। 
हमेशा महिलाओं का सम्मान करें
प्रसंग- एक बार एक विदेशी महिला स्वामी विवेकानंद के पास आकर बोली- मैं आपसे शादी करना चाहती हूं। विवेकानंद बोले- मुझसे ही क्यों? क्या आप जानती नहीं कि मैं एक संन्यासी हूं? महिला ने कहा, ''मैं आपके जैसा गौरवशाली, सुशील और तेजस्वी बेटा चाहती हूं और यह तभी संभव होगा। जब आप मुझसे शादी करें।'' स्वामी जी ने महिला से कहा, ''हमारी शादी तो संभव नहीं है, लेकिन एक उपाय जरूर है। मैं ही आपका पुत्र बन जाता हूं। आज से आप मेरी मां बन जाओ। आपको मेरे जैसा ही एक बेटा मिल जाएगा।'' इतना सुनते ही महिला स्वामी जी के पैरों में गिर गई और मांफी मांगने लगी।
सीख- एक सच्चा पुरूष वह है जो हर महिला के लिए अपने अंदर मातृत्व की भावना पैदा कर सके और महिलाओं का सम्मान कर सके। 
मां से बढ़कर कोई नहीं
प्रसंग- मां की महिमा जानने के लिए एक आदमी स्वामी विवेकानंद के पास आया। इसके लिए स्वामी जी ने आदमी से कहा, ''5 किलो का एक पत्थर कपड़े में लपेटकर पेट पर बांध लो और 24 घंटे बाद मेरे पास आना, तुम्हारे हर सवाल का उत्तर दूंगा।'' दिनभर पत्थर बांधकर वह आदमी घूमता रहा, थक-हारकर स्वामी जी के पास पंहुचा और बोला- मैं इस पत्थर का बोझ ज्यादा देर तक सहन नहीं कर सकता हूं। स्वामी जी मुस्कुराते हुए बोले, ''पेट पर बंधे इस पत्थर का बोझ तुमसे सहन नहीं होता। एक मां अपने पेट में पलने वाले बच्चे को पूरे नौ महीने तक ढ़ोती है और घर का सारा काम भी करती है। दूसरी घटना में स्वामी जी शिकागो धर्म संसद से लौटे तो जहाज से उतरते ही रेत से लिपटकर रोने गले थे। वह भारत की धरती को अपनी मां समझते थे और लिपटकर खूब रोए थे।
सीख- संसार में मां के सिवा कोई इतना धैर्यवान और सहनशील नहीं है। इसलिए मां से बढ़ कर इस दुनिया में कोई और नहीं है।

Tuesday, 5 May 2015

नारद जयंती कल: भगवान विष्णु के परम भक्त हैं ये देवर्षि

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार ज्येष्ठ मास में नारद जयंती मनाई जाती है। इस बार नारद जयंती का पर्व 6 मई, बुधवार को है। शास्त्रों के अनुसार नारद मुनि, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक हैं। उन्होंने कठिन तपस्या से देवर्षि पद प्राप्त किया है। वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते हैं। देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक कल्याण के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रों में देवर्षि नारद को भगवान का मन भी कहा गया है।
ग्रंथों में देवर्षि नारद को भगवान विष्णु का अवतार भी बताया गया है। श्रीमद्भागवत गीता के दशम अध्याय के 26वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है- देवर्षीणाम्चनारद:। अर्थात देवर्षियों में मैं नारद हूं। महाभारत के सभा पर्व के पांचवें अध्याय में नारद जी के व्यक्तित्व का परिचय इस प्रकार दिया गया है- देवर्षि नारद वेद और उपनिषदों के मर्मज्ञ, देवताओं के पूज्य, इतिहास व पुराणों के विशेषज्ञ, पूर्व कल्पों (अतीत) की बातों को जानने वाले, शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान, संगीत-विशारद, प्रभावशाली वक्ता, मेधावी, नीतिज्ञ, कवि, महापंडि़त, बृहस्पति जैसे महा विद्वानों की शंकाओं का समाधान करने वाले और सर्वत्र गति वाले हैं। 18 महापुराणों में एक नारदोक्त पुराण; बृहन्नारदीय पुराण के नाम से प्रख्यात है।
नारद मुनि के श्राप के कारण भगवान विष्णु को सहना पड़ा स्त्री वियोग
देवर्षि नारद को एक बार इस बात का घमंड हो गया कि कामदेव भी उनकी तपस्या और ब्रह्मचर्य को भंग नहीं कर सके। नारदजी ने यह बात शिवजी को बताई। देवर्षि के शब्दों में अहंकार भर चुका था, वे स्वयं शिवजी के सामने अपने अभिमान को प्रदर्शित कर रहे थे। शिवजी यह समझ चुके थे कि नारद अभिमानी हो गए हैं। भोलेनाथ ने नारद से कहा कि भगवान श्रीहरि के समक्ष अपना अभिमान इस प्रकार प्रदर्शित मत करना। इसके बाद नारद भगवान विष्णु के समीप पहुंच गए और शिवजी के समझाने के बाद भी उन्होंने श्रीहरि के सामने अपना घमंड प्रदर्शित किया।
तब श्रीहरि ने सोचा कि नारद का घमंड तोडना होगा, यह शुभ लक्षण नहीं है। इसके बाद नारद विष्णुजी को प्रणाम कर आगे बढ़े गए। रास्ते में उन्हें एक बहुत ही सुंदर नगर दिखाई दिया, जहां किसी राजकुमारी के स्वयंवर का आयोजन किया जा रहा था। नारद भी वहां पहुंच गए और राजकुमारी को देखते ही मोहित हो गए। यह सब भगवान श्रीहरि की माया ही थी। राजकुमारी का रूप और सौंदर्य नारद के तप को भंग कर चुका था। इस कारण उन्होंने राजकुमारी के स्वयंवर में हिस्सा लेने का मन बनाया।
नारद भगवान विष्णु के पास गए और कहा कि आप अपना सुंदर रूप मुझे दे दीजिए, जिससे कि वह राजकुमारी स्वयंवर में मेरा ही वरण करे। भगवान ने ऐसा ही किया, लेकिन जब नारद मुनि स्वयंवर में गए तो उनका मुख वानर के समान हो गया। उस स्वयंवर में भगवान शिव के दो गण भी थे, वे यह सभी बातें जानते थे और ब्राह्मण का वेष बनाकर यह सब देख रहे थे। जब राजकुमारी अपने वर का चयन करने स्वयंवर में आई तो वानर के मुख वाले नारदजी को देखकर वह बहुत क्रोधित हुई। उसी समय भगवान विष्णु एक राजा का रूप धारण कर वहां आ गए।
सुंदर रूप देखकर राजकुमारी ने उनका वरण कर लिया। यह देखकर शिवजी के गण वानर के समान मुख वाले नारदजी की हंसी उड़ाने लगे और कहा कि पहले अपना मुख दर्पण में देखिए। जब नारदजी ने अपने चेहरा वानर के समान देखा तो वह बहुत क्रोधित हुए। नारद मुनि उसी समय उन शिवगणों को राक्षस योनी में जन्म लेने का श्राप दे दिया। शिवगणों को श्राप देने के बाद नारदजी भगवान विष्णु के पास गए और क्रोधित होकर उन्हें बहुत भला-बुरा कहने लगे। माया से मोहित होकर नारद मुनि ने श्रीहरि को श्राप दिया कि जिस तरह आज मैं स्त्री के लिए व्याकुल हो रहा हूं, उसी प्रकार मनुष्य जन्म लेकर आपको भी स्त्री वियोग सहना पड़ेगा।
उस समय वानर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। भगवान विष्णु ने कहा- ऐसा ही हो और नारद मुनि को माया से मुक्त कर दिया। तब नारद मुनि को अपने कटु वचन और व्यवहार पर बहुत ग्लानि हुई और उन्होंने भगवान श्रीहरि से क्षमा मांगी। भगवान श्रीहरि ने कहा कि ये सब मेरी ही इच्छा से हुआ है अत: तुम शोक न करो। इस प्रकार नारद मुनि को ढाढ़स बंधा कर श्रीहरि वहां से चले गए। उसी समय वहां भगवान शिव के गण आए, जिन्हें नारद मुनि ने श्राप दिया था।
उन्होंने नारद मुनि ने क्षमा मांगी। तब नारद मुनि ने कहा कि तुम दोनों राक्षस योनी में जन्म लेकर सारे विश्व को जीत लोगे, तब भगवान विष्णु मनुष्य रूप में तुम्हारा वध करेंगे और तुम्हारा कल्याण होगा। नारद मुनि के इन्हीं श्रापों के कारण उन शिव गणों ने रावण व कुंभकर्ण के रूप में जन्म लिया और श्रीराम के रूप में अवतार लेकर भगवान विष्णु को स्त्री वियोग सहना पड़ा।
नारद मुनि ने ही बताया था कैसा होगा पार्वती का पति
सती के रूप में आत्मदाह करने के बाद माता शक्ति ने पर्वतराज हिमालय के यहां पार्वती के रूप में जन्म लिया। जब से पार्वती हिमाचल के घर में जन्मी, तब से उनके घर में सुख और सम्पतियां छा गई। पार्वती जी के आने से पर्वत शोभायमान हो गया। जब नारदजी ने ये सब समाचार सुने तो वे हिमाचल पहुंचे। वहां पहुंचकर वे हिमाचल से मिले और हंसकर बोले तुम्हारी कन्या गुणों की खान है। यह स्वभाव से ही सुन्दर, सुशील और शांत है। परंतु इसका पति गुणहीन, मानहीन, माता-पिता विहीन, उदासीन, लापरवाह, योगी, जटाधारी और सांपों को गले में धारण करने वाला होगा। यह बात सुनकर पार्वती के माता-पिता चिंतित हो गए। उन्होंने देवर्षि से इसका उपाय पूछा।
तब नारद जी बोले जो दोष मैंने बताए मेरे अनुमान से वे सभी शिव में है। अगर शिवजी के साथ विवाह हो जाए तो ये दोष गुण के समान ही हो जाएंगे। यदि तुम्हारी कन्या तप करे तो शिवजी ही इसकी किस्मत बदल सकते हैं। तब यह सुनकर पार्वतीजी की मां विचलित हो गई। उन्होंने पार्वती के पिता से कहा आप अनुकूल घर में ही अपनी पुत्री का विवाह कीजिएगा क्योंकि पार्वती मुझे प्राणों से अधिक प्रिय है। पार्वती को देखकर मैना का गला भर आया। पार्वती ने अपनी मां से कहा मां मुझे एक ब्राह्मण ने सपने में कहा है कि जो नारदजी ने कहा है तू उसे सत्य समझकर जाकर तप कर। यह तप तेरे लिए दुखों का नाश करने वाला है। उसके बाद माता-पिता को बड़ी खुशी से समझाकर पार्वती तप करने गई।