Thursday, 30 April 2015

यमराज का एकमात्र मंदिर, यहां जानें से डरते हैं लोग


कहते हैं यमराज का एक मंदिर ऐसा है, जहां मरने के बाद हर किसी को जाना ही पड़ता है चाहे वह आस्तिक हो या नास्तिक। यह मंदिर किसी और दुनिया में नहीं बल्कि भारत की जमीन पर स्थित है। दिल्ली से करीब 500 किलोमीटर की दूरी पर हिमाचल के चम्बा जिले में भरमौर नामक स्थान में स्थित इस मंदिर के बारे में कुछ बड़ी अनोखी मान्यताएं प्रचलित हैं। यहां पर एक ऐसा मंदिर है जो घर की तरह दिखाई देता है। इस मंदिर के पास पहुंच कर भी बहुत से लोग मंदिर में प्रवेश करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं।
मंदिर को बाहर से प्रणाम करके चले आते हैं। इसका कारण यह है कि, इस मंदिर में धर्मराज यानी यमराज रहते हैं। संसार में यह इकलौता मंदिर है जो धर्मराज को समर्पित है। इस मंदिर में एक खाली कमरा है जिसे चित्रगुप्त का कमरा माना जाता है। चित्रगुप्त यमराज के सचिव हैं जो जीवात्मा के कर्मो का लेखा-जोखा रखते हैं।
मान्यता है कि जब किसी प्राणी की मृत्यु होती है तब यमराज के दूत उस व्यक्ति की आत्मा को
पकड़कर सबसे पहले इस मंदिर में चित्रगुप्त के सामने प्रस्तुत करते हैं। चित्रगुप्त जीवात्मा को उनके कर्मो का पूरा ब्योरा देते हैं। इसके बाद चित्रगुप्त के सामने के कक्ष में आत्मा को ले जाया जाता है। इस कमरे को यमराज की कचहरी कहा जाता है।
यहां पर यमराज कर्मों के अनुसार आत्मा को अपना फैसला सुनाते हैं। यह भी मान्यता है इस मंदिर में चार अदृश्य द्वार हैं जो स्वर्ण, रजत, तांबा और लोहे के बने हैं। यमराज का फैसला आने के बाद यमदूत आत्मा को कर्मों के अनुसार इन्हीं द्वारों से स्वर्ग या नर्क में ले जाते हैं। गरूड़ पुराण में भी यमराज के दरबार में चार दिशाओं में चार द्वार का उल्लेख किया गया है।
कैसे पहुंचे- दिल्ली से सड़क या रेलमार्ग द्वारा चम्बा पहुंचकर आसानी से सड़क के रास्ते भरमौर पहुंचा जा सकता है।

Friday, 24 April 2015

Death Anniversary: राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’

आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पुण्यतिथि है !
सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नही विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं
मानव जब ज़ोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।

हिन्दी के सुविख्यात कवि रामाधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 ई. में सिमरिया, (बिहार) में हुआ था।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने हिंदी साहित्य में न सिर्फ वीर रस के काव्य को एक नयी ऊंचाई दी, बल्कि अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का भी सृजन किया.
पद्म भूषण से सम्मानित दिनकर राज्यसभा के सदस्य भी रहे. वर्ष 1972 में उन्हें ज्ञानपीठ सम्मान भी दिया गया. 24 अप्रैल, 1974 को उनका देहावसान हो गया।

Thursday, 23 April 2015

हिंद महासागर के आइलैंड पर रहती हैं खूंखार जनजाति, मार डालते हैं लोगों को

(नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड)
आकाश से यह एक सामान्य सा आईलैंड जैसा ही दिखता है, लेकिन असल में यह हिंद महासागर का एक खतरनाक आइलैंड है। नॉर्थ सेंटिनल नाम के इस आइलैंड पर बेहद रहस्यमई जनजाति रहती हैं। इन लोगों ने आधुनिक सभ्यता को पूरी तरह रिजेक्ट कर दिया है और दुनिया से इनका संपर्क जीरो है। कहा जाता है कि ये जब भी दुनिया के किसी शख्स से मिलते हैं तो हिंसा के साथ ही। आसपास में नीचे उड़ते हवाइजहाजों का ये पत्थरों से स्वागत करते हैं।
इतना ही नहीं टूरिस्ट के अलावा मछुआरों के लिए भी यह आइलैंड बेहद खतरनाक है। 2006 में यहां के जनजातियों ने कई मछुआरों को मार डाला था। इससे पहले भी कई बार ये हिंसा कर चुके हैं। हालांकि ये जनजाति करीब 60,000 सालों से रह रही हैं। इन लोगों को Lost Tribe भी कहा जाता है। कुछ रिपोर्टों में इसे दुनिया की सबसे अलग-थलग रहने वाली जनजाति करार दिया गया है। बंगाल की खाड़ी के पास स्थित इस आइलैंड के लोगों की जिंदगी में भारत सरकार भी हस्तक्षेप नहीं करना चाहती।

सच बोलना महानता की सबसे पहली निशानी है

स्वामी विवेकानंद शुरू से ही एक मेधावी छात्र थे। सभी लोग उनके व्यक्तित्व और वाणी से प्रभावित रहते थे। जब वो अपने साथी छात्रों से कुछ बताते तो सब मंत्रमुग्ध हो कर उन्हें सुनते थे। एक दिन कक्षा में वो कुछ दोस्तों कहानी सुना रहे थे। सभी उनकी बातें सुनने में इतने मग्न थे कि उन्हें पता ही नहीं चला की कब मास्टर जी कक्षा में आए और पढ़ाना शुरू कर दिया। मास्टर जी ने अभी पढऩा शुरू ही किया था कि उन्हें कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी। कौन बात कर रहा है? मास्टर जी ने तेज आवाज़ में पूछा। सभी छात्रों ने स्वामी जी और उनके साथ बैठे छात्रों की तरफ इशारा कर दिया। मास्टर जी क्रोधित हो गए।

उन्होंने तुरंत उन छात्रों को बुलाया और पाठ से संबधित प्रश्न पूछने लगे। जब कोई भी उत्तर नहीं दे पाया। तब अंत में मास्टर जी ने स्वामी जी से भी वही प्रश्न किया, स्वामी जी तो मानो सब कुछ पहले से ही जानते हों , उन्होंने आसानी से उस प्रश्न का उत्तर दे दिया। यह देख मास्टर जी को यकीन हो गया कि स्वामी जी पाठ पर ध्यान दे रहे थे और बाकी छात्र बातचीत में लगे हुए थे। फिर क्या था। उन्होंने स्वामी जी को छोड़ सभी को बेंच पर खड़े होने की सजा दे दी। सभी छात्र एक-एक कर बेच पर खड़े होने लगे, स्वामी जी ने भी यही किया। मास्टर जी बोले नरेन्द्र तुम बैठ जाओ। नरेन्द्र बोले सर, मुझे भी खड़ा होना होगा, क्योंकि वो मैं ही था जो इन छात्रों से बात कर रहा था। स्वामी जी ने आग्रह किया। सभी उनकी सच बोलने की हिम्मत देख बहुत प्रभावित हुए।
सीख: 1.सच बोलना महानता की सबसे पहली निशानी है।
2. सच बोलने के लिए हिम्मत और आत्मविश्वास दोनों आवश्यक है।

B'day: 46 साल के हुए मनोज बाजपेयी, फैमिली के साथ ऐसे बिताते हैं वक्त

परदे पर संजीदा एक्टिंग के जरिए अभिनय की नई परिभाषा गढ़ने वाले मनोज बाजपेयी 46 साल के हो चुके हैं। 23 अप्रैल 1969 को बिहार में उनका जन्म हुआ था। मनोज ने अभिनय की पारी दूरदर्शन पर प्रसारित सीरियल 'स्वाभिमान' से की। वहीं, एक प्रयोगधर्मी अभिनेता के रूप में पहचान बना चुके मनोज का फिल्मी सफर शेखर कपूर की बहुचर्चित फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ के साथ शुरू हुआ। लेकिन बॉलीवुड में उनको सही मुकाम रामगोपाल वर्मा की फिल्म सत्या’ ने दिलाया। इसमें उन्होंने भीखू म्हात्रे का किरदार इतने संजीदा और बेहतर ढंग से निभाया कि इसके लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल अवॉर्ड भी मिला। इसके अलावा ‘शूल’ ने जहां उन्हें बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया, तो वहीं पिंजर के लिए उन्हें एक बार फिर राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया।
अब तक के करियर में दी कई यादगार फिल्में
अब तक के करियर में उन्होंने वीर जारा, जुबैदा, रोड, अक्स, शूल, स्पेशल 26, चक्रव्यूह और गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी यादगार फिल्में दी है। मनोज ने 2006 में एक्ट्रेस शबाना रजा के साथ शादी की। जिसके बाद उनके यहां बेटी अावा नायला का जन्म हुआ। मनोज बाजपेयी के जन्मदिन के मौके पर Dainikbhaskar.com आपको उनकी लाइफ से जुड़े कुछ दिलचस्प पहलुओं से वाकिफ कराने जा रहा है।
जब कैटरीना हुई मनोज की एक्टिंग से इम्प्रेस्ड
प्रकाश झा की फिल्म राजनीति में मनोज बाजपेयी ने बेजोड़ एक्टिंग का नमूना पेश किया। इसमें उनके द्वारा निभाए गए वीरेंद्र प्रताफ उर्फ वीरू भैया के किरदार ने अभिनय का एक नया मुहावरा गढ़ा।बताया जाता है कि इस फिल्म के प्रीमियर शो के बाद कैटरीना कैफ मनोज की एक्टिंग से इस कदर प्रभावित हुईं कि उन्होंने उठकर उनके पैर छू लिए। वहीं ये भी दिलचस्प बात है कि मनोज बाजयेपी नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से चार बार रिजेक्ट किए गए। हालांकि, उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और इसके बाद उन्होंने बैरी जॉन के साथ थियेटर किया।
किरदारों में पूरी तरह डूब जाते हैं मनोज
अपने सिने सफर में अलग-अलग तरह के किरदार निभाने वाले मनोज बाजपेयी का ड्रीम रोल देवदास है, जिसे वो निभाना चाहते थे, लेकिन अब तक उनकी ये ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी है। एक बार मनोज बाजपेयी ने कहा था कि वो अपने किरदारों में इतने खो जाते हैं कि वो रियल लाइफ और रील लाइफ में फर्क करना ही भूल जाते हैं।
जब दिल्ली में रहते हुए गुजारे तंगहाली के दिन
बताया जाता है कि एक जमाने में मनोज बाजपेयी दिल्ली में तीन सौ रुपए प्रतिमाह में गुजर-बसर करते थे, जिसमें से एक सौ पचास रुपए. उन्हें अपने पिता से मिलते थे और बाकी एक सौ पचास रु. वो नुक्कड़ नाटकों में एक्टिंग के जरिए कमाते थें।

मुक्तेश्वर धाम: पांडवों ने यहां काटा था अज्ञातवास, की थी शिव की पूजा

चक्रवर्ती सम्राट युद्धिष्ठिर को उनके अपने चचेरे भाइयों और मामा शकुनि ने चौसर के खेल में हरा दिया। शर्त थी कि 12 साल का वनवास और फिर एक साल का अज्ञातवास काटना होगा। पकड़े गए तो फिर से वही सजा। यही है वह जगह, जहां की दुर्गम पहाड़ियों में सम्राट युद्धिष्ठिर ने चारों भाइयों और पांचाली द्रौपदी के साथ वह बुरा वक्त काटा। 5500 साल पुराना इतिहास संजोने वाली इस जगह को आज मुक्तेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है।
सीमांत जिले पठानकोट का अर्द्धपर्वतीय क्षेत्र। कल्पना भी नहीं की जा सकती कि यहां कभी कोई रहा भी होगा, लेकिन मान्यता है कि पांचों पांडव और पांचाली द्रौपदी ब्राह्मण, साधु और संन्यासियों के वेश में छिपते–छिपाते पंचनद प्रदेश (वर्तमान पंजाब) में शिवालिक पहाड़ियों के मध्य स्थित इरावती नदी (मौजूदा नाम रावी) के तट पर पहुंचे। यहां उन्होंने छह माह का वक्त गुजारा।
यह है मुक्तेश्वर धाम की खासियत
रणजीत सागर बांध और पठानकोट के बीच (पठानकोट से 22 किलोमीटर दूर) रावी नदी के किनारे गांव ढूंग में पांडवों ने पहाड़ियों को काटकर गुफाओं का निर्माण किया। एक गुफा में शिव मंदिर कक्ष, रसोई कक्ष, सभागार और दूसरी गुफा में एक अंगरक्षक सहायक तेली को रात में जागते रहने के लिए कोहलू गुफा का निर्माण किया। तीसरी गुफा द्रौपदी के लिए आरक्षित थी और चौथी में दूध और भोजन भंडारण किया जाता था। आज इन गुफाओं तक पहुंचने के लिए 164 पौड़ियां पहाड़ी से नीचे की तरफ विकसित की गई हैं।
मंडरा रहा है इतिहास पर खतरा
अब शाहपुर कंडी में बांध बनने के चलते इसकी झील में इस स्वर्णिम इतिहास के लोप हो जाने का खतरा पैदा हो गया है। यह प्रोजेक्ट 2016 में पूरा हो जाएगा। इसका जलस्तर लगभग 405 मीटर निर्धारित किया गया है। एक और दो नंबर की गुफाएं पूरी तरह से जल में समा जाएंगी। गुफा नंबर के दरवाजे का निचला तल 401 मीटर पर है। 20 फरवरी 1995 को जब इसे असुरक्षित घोषित किया गया तो ग्राम पंचयातों के प्रयास से 29 मार्च 1995 को भूमि-अधिग्रहण विभाग की मीटिंग में यह फैसला लिया गया कि मुक्तेश्वर मंदिर के 22 कनाल एरिया का अधिग्रहित नहीं किया जाएगा। बावजूद इसके जब सरकारें या प्रशासन गंभीर नहीं हुआ तो मुक्तेश्वर धाम बचाओ समिति के बैनर तले यह एक जन आंदोलन बन गया।
अगर प्रशासन वादे पर खरा न उतरा तो...
हालांकि शिवभक्तों के जनआंदाेलन और प्राचीन इतिहास के मद्देनजर प्रशासन इसे बचाने के कई बार वादे कर चुका है, लेकिन अगर प्रशासन ने वादाखिलाफी की तो...। हो सकता है यह पवित्र इतिहास जलमग्न हो जाए। शाहपुर कंडी बांध प्रशासन के अनुसार यहां बनने वाली झील में लगभग 405 मीटर पानी हर वक्त भरा रहेगा, ऐसे में इस गुफा के निचले तल (401 मीटर समुद्र तल से ऊंचाई) के ऊपर भी कई मीटर पानी भर जाएगा।
कब-कब क्या हुआ धाम को बचाने के लिए
बरसों से चल रहे संघर्ष के बीच 13 अक्तूबर 2014 को पठानकोट में एक रैली निकाली गई। इसमें शामिल 5 हजार शिवभक्तों ने पठानकोट के डीसी को एक मांगपत्र सौंपा था। इसके बाद 19 अक्तूबर 2014 को फिर अधिकारियों की एक बैठक हुई। इसमें चीफ इंजीनियर हरविंदर सिंह ने आश्वासन दिया था कि छह महीने के भीतर प्रोपोजल तैयार करके धाम को बचाने के लिए काम शुरू कर देंगे। अब इस बात को सातवां महीना चल रहा है। अभी तक तो यह आश्वासन महज एक आश्वासन ही है।

राजा हरिशचंद्र सत्यवादी क्यों कहलाए?

सूर्यवंश के 48 वें राजा हरिशचंद्र अपनी सत्यनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध है। उनकी सत्य के प्रति निष्ठा उनके सैकड़ों साल बाद भी सत्य का प्रतीक बनी हुई है। इनका युग त्रैता माना जाता है। इसलिए सभी पौराणिक ग्रंथों में हरिशचंद्र सत्य व्रत की कथा पूरे रस और प्रभाव के साथ मिलती है। महाभारत के आदिपर्व के लोकपाल समाख्यान पर्व व श्रीमद्भागवत पुराण के संदर्भो के अनुसार हरिशचंद्र त्रिशंकु के पुत्र थे। गीता प्रेस से प्रकाशित भक्त चरितांक में उपलब्ध संदर्भ के अनुसार विश्वामित्र ने तप के प्रभाव से हरिशचंद्र से स्वप्न में उनका संपूर्ण राज्य दान में ले लिया।

दूसरे दिन अयोध्या में जाकर विश्वामित्र ने हरिशचंद्र से दान मांगा। हरिशचंद्र के सत्य की पराकाष्ठा यह थी कि उन्होंने सपने मे जो दान दिया था उसे सच में निभाया और पूरा राज्य विश्वामित्र को दान दे दिया। हरिशचंद्र काशी में जाकर बस गए। उन्हें श्मशान मे चांडाल का काम करना पड़ा दरिद्रता का असर उनकी पत्नी शैव्या और पुत्र रोहिताश्व पर भी हुआ। एक दिन सर्पदंश से रोहिताश्व की मौत हो गई। उस समय अपने ही पुत्र के अंतिम संस्कार शुल्क के लिए हरिशचंद्र अड़ गए। तब उनकी पत्नी ने साड़ी का अाधा हिस्सा करके शुल्क रूप में देना चाहा तो भगवान प्रकट हुए और हरिशचंद्र की सत्यनिष्ठा स्वीकार की। इस तरह स्वप्न में दान और अपने ही पुत्र के लिए शुल्क के नियम पर अड़ना हरिशचंद्र की सत्यवादिता का प्रमाण बना।