Saturday, 18 April 2015

ये है विश्व की दूसरी सबसे बड़ी दीवार, बनाने को चढ़ानी पड़ी थी संत की बलि

18 अप्रैल यानी आज 'वर्ल्ड हेरिटेज डे' है। इस मौके पर हम आपको उन धरोहरों के बारे में बता रहे है जिनके महत्व ने उनका नाम इतिहास में दर्ज करा दिया। भारत में ऐसे कई किले, उद्यान और जगहें हैं, जिन्हें विश्व विरासत में जगह मिली है। वहीं, कुछ ऐसे भी हैं जो इस लिस्ट में शामिल होने के लायक हैं। दुनिया में सबसे लंबी दीवार का खिताब चीन के पास है लेकिन बहुत कम लोग ही शायद इस बात से वाकिफ हों कि दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार राजस्थान में स्थित है। यह दीवार राजस्थान के अभेद्य माने जाने वाले कुंभलगढ़ किले की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी। कुंभलगढ़ किले का निर्माण राजा कुंभा ने करवाया था। यह किला राजस्थान के उन 6 किलों में से एक है जो वर्ल्ड हेरिटेज की सूची में शामिल हैं। इस किले के चारो तरफ बनी इस दीवार को भेदने की कोशिश महान राजा अकबर ने भी किया, लेकिन भेद न सके। इस दीवार की मोटाई इतनी है कि उस पर 10 घोड़े एक साथ दौड़ सकते हैं।
कैसे बनी ये 36 किलोमीटर लंबी दीवार
किले के दीवार की निर्माण से जुड़ी कहानी बहुत ही दिलचस्प है। 1443 में इसका निर्माण शुरू किया गया। दरअसल, इस दीवार का काम इसलिए करवाया जा रहा था ताकि विरोधियों से सुरक्षा हो सके। लेकिन किले के निर्माण में दीवार का बनना बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी। ऐसा माना जाता है कि अंतत: वहां की देवी के आह्वान पर एक संत की बलि दी गई फिर जाकर इस दीवार का निर्माण कार्य पूरा हो पाया।
इस किले के लिए चढ़ाई गई संत की बलि
देवी कुछ और ही चाहती हैं। राजा इस बात पर चिंतित हो गए और एक संत को बुलाया और पूरी कहानी सुनाकर इसका हल पूछा। संत ने बताया कि देवी इस काम को तभी आगे बढ़ने देंगी जब स्वेच्छा से कोई मानव बलि के लिए खुद को प्रस्तुत करे। राजा इस बात से चिंतित होकर सोचने लगे कि आखिर कौन इसके लिए आगे आएगा। तभी संत ने कहा कि वह खुद बलिदान के लिए तैयार है और इसके लिए राजा से आज्ञा मांगी।
जहां गिरा संत का सिर वहां बना मुख्य द्वार
संत ने कहा कि उसे पहाड़ी पर चलने दिया जाए और जहां वो रुके वहीं उनकी बलि चढ़ा दी जाए और वहां एक देवी का मंदिर बनाया जाए। ठीक ऐसा ही हुआ और वह कुछ किलोमीटर तक चलने के बाद रुक गया और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया। जहां पर उसका सिर गिरा वहां मुख्य द्वार है और जहां पर उसका शरीर गिरा वहां दूसरा मुख्य द्वार है। यह किला चारो तरफ से अरावली की पहाड़ियों की मजबूत ढाल द्वारा सुरक्षित है।
चीन के बाद सबसे लंबी दीवार
इसका निर्माण पंद्रहवी सदी में राणा कुंभा ने करवाया था। पर्यटक किले के ऊपर से आसपास के रमणीय दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। शत्रुओं से रक्षा के लिए इस किले के चारों ओर दीवार का निर्माण किया गया था। ऐसा कहा जाता है कि चीन की महान दीवार के बाद यह सबसे लंबी दीवार है। यह किला 1,914 मीटर की ऊंचाई पर समुद्र स्तर से परे क्रेस्ट शिखर पर बनाया गया है। इस किले के निर्माण को पूरा करने में 15 साल का समय लागा। दुर्ग की विशालता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह किसी एक पहाड़ी पर बना हुआ नहीं है, बल्कि इसे कई घाटियों और पहाड़ियों को मिलाकर गढ़ा गया है।
दस घोड़े एक साथ दौड़ते है इसके दीवार पर
महाराणा कुंभा के रियासत में कुल 84 किले आते थे जिसमें से 32 किलों का नक्शा उसके द्वारा बनवाया गया था। कुंभलगढ़ भी उनमें से एक है। इस किले की दीवार की चौड़ाई इतनी ज्यादा है कि 10 घोड़ एक ही समय में उसपर दौड़ सकते हैं। वहीं, चीन की दीवार पर एक साथ केवल 5 घोड़े दौड़ सकते हैं। एक मान्यता यह भी है कि महाराणा कुंभा अपने इस किले में रात में काम करने वाले मजदूरों के लिए 50 किलो घी और 100 किलो रूई का प्रयोग करते थे।
सुरक्षा ऐसी कि परिंदा भी न मार सके पैर
सुरक्षा को मद्देनजर इस दुर्ग में ऊंचे स्थानों पर महल, मंदिर व आवासीय इमारतें बनायीं गई और समतल भूमि का उपयोग कृषि कार्य के लिए किया गया। वहीं, ढलान वाले भागों का उपयोग जलाशयों के लिए कर इस दुर्ग को यथासंभव स्वावलंबी बनाया गया। इस दुर्ग के भीतर एक और गढ़ है जिसे कटारगढ़ के नाम से जाना जाता है यह गढ़ सात विशाल द्वारों व सुदृढ़ प्राचीरों से सुरक्षित है।
सिर्फ एक बार छाया किले पर हार का साया
कुंभलगढ़ को अपने इतिहास में सिर्फ एक बार हार का सामना करना पड़ा जब मुगल सेना ने किले की तीन महिलाओं को जान से मारने की धमकी देकर अंदर प्रवेश करने का रास्ता पूछा। महिलाओं ने डर से एक गुप्त द्वार बताया, लेकिन इसके बाद भी मुगल अंदर जाने में सफल नहीं हो पाए। एक बार फिर अकबर के बेटे सलीम ने भी इस किले पर फतह करने की सोची, लेकिन उसे भी खाली हाथ वापस लौटना पड़ा।
धोखा देने पर चुनवा दिया दीवार में
कुछ समय बाद जब राजा को उस महिलाओं के बारे में पता चला तो उन्होंने तीनों को किले के द्वार पर दीवार में जिंदा चुनवा दिया। ऐसा कर राजा ने लोगों को यह संदेश दिया कि राज्य के सुरक्षा के साथ जो भी खिलवाड़ करेगा उसका यही अंजाम होगा।
यहां का लाइट और साउंड शो है सबसे फेमस
किले के अंदर प्रवेश के लिए सात द्वार बने हुए हैं जिसमें, राम द्वार, पग्र द्वार, हनुमान द्वार आदि फेमस हे। इस किले के अंदर कुल 360 मंदिरों का समूह है जिसमें, 300 जैन मंदिर और 60 हिन्दू मंदिर हैं। इनमें से नीलकंठ महादेव के मंदिर का महत्व अन्य मंदिरों से ज्यादा है। इस मंदिर के पास देर शाम होने वाले लाइट और साउंड शो की अपनी एक अलग पहचान है। इस शो में बेहदखूबसूरती से कुंभलगढ़ किला के पूरे इतिहास के बारे में बताया जाता है। चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़, घोड़ों के दौडऩे और बंदूकों की गोलियों की आवाज आज भी लोगों को प्रचीन समय का आभास कराता है।
जिसे कोई और न मार सका उसके बेटे ने ही ले ली जान
महाराणा प्रताप की जन्म स्थली कुंभलगढ़ एक तरह से मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी रहा है। महाराणा कुंभा से लेकर महाराणा राज सिंह के समय तक मेवाड़ पर हुए आक्रमणों के समय राजपरिवार इसी दुर्ग में रहा। यहीं पर पृथ्वीराज और महाराणा सांगा का बचपन बीता था। जिन महाराणा कुंभा को कोई नहीं हरा सका, उन्हें उन्हीं के पुत्र उदयकर्ण ने राजलिप्सा के लिए मार डाला। महाराणा के ज्येष्ठ पुत्र उदयसिंह को ऊदा के नाम से भी जाना जाता है। ऊदा ने यहीं एक कुंड के पास पिता कुंभा की हत्या कर दी थी।
इसे बनाते समय रखा गया वास्तु शास्त्र का ध्यान
वास्तु शास्त्र के नियमानुसार बने इस दुर्ग में प्रवेश द्वार, प्राचीर,जलाशय, बहार जाने के लिए संकटकालीन द्वार, महल, मंदिर, आवासीय इमारते, यज्ञ वेदी, स्तम्भ, छत्रियां आदि बने है।
नीलकंठ महादेव मंदिर
नीलकंठ महादेव मंदिर, कुंभलगढ़ किले के पास स्थित है। इस मंदिर में पत्थर से बना हुआ छह फुट का शिवलिंग है। यह पवित्र स्थल भगवान शिव को समर्पित है, जो कि इस क्षेत्र के मुख्य देवता हैं। इतिहास के अनुसार राजा राणा कुंभा इस देवता की पूजा करते थे।
हरियाली में है गजब
उदयपुर के निकट यह कुंभलगढ़ अभ्यारण्य, चार सींगों वाले हिरन या चौसिंघा, काला तेंदुआ,जंगली सूअर, भेड़ियों, भालू, सियार, सांभर हिरन, चिंकारा, तेंदुओं,लकड़बघ्घों, जंगली बिल्ली, नीलगाय और खरगोश देखने के लिए आदर्श स्थल है। राज्य में केवल इस अभ्यारण्य में ही पर्यटक भेड़ियों को देख सकते हैं।
इस महल में बिना एसी के ही बनी रहती है ठंढक
बादल महल को ‘बादलों के महल' के नाम से भी जाना जाता है। इसकी खासियत है इसकी अद्भुत बनावट। इसमें इसमें बिना एयर कंडिशन के ठंड का अहसास होता है। यह कुंभलगढ़ किले के शीर्ष पर स्थित है। इस महल में दो मंजिलें हैं एवं यह संपूर्ण भवन दो आतंरिक रूप से जुड़े हुए खंडों, मर्दाना महल और जनाना महल में विभाजित हैं। इस महल के कमरों को पेस्टल रंगों के भित्ति चित्रों के साथ चित्रित किया गया है जो उन्नीसवीं शताब्दी के काल को प्रदर्शित करते हैं। फिरोजी, हरा एवं सफेद इन भव्य कमरों के मुख्य रंग हैं।
इस मंदिर में दिखती है धन के देवता कुबेर की छवि
मम्मदेव मंदिर का निर्माण राजा राणा कुंभा ने वर्ष 1460 में करवाया था। यह तीर्थ कुंभलगढ़ किले के नीचे स्थित है और इसमें चार तख्ते हैं। पर्यटक तख्तों पर खुदे हुए शिलालेख देख सकते हैं जो मेवाड़ का इतिहास बताते हैं। यहां इतिहास गुहिल के काल से प्रारंभ होकर राणा कुंभा के समय तक लिखा गया है। गुहिल मेवाड़ के संस्थापक थे। वर्तमान में ये तख्ते उदयपुर के संग्रहालय में सुरक्षित रूप से रखे हुए हैं। पर्यटक मंदिर के भीतर धन के देवता कुबेर की छवि एवं दो कब्रों को देख सकते हैं।
परशुराम मंदिर
परशुराम मंदिर एक प्राचीन गुफा के अंदर स्थित है एवं प्रसिद्ध संत परशुराम को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार संत परशराम ने भगवान राम का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यहां तपस्या की थी। पर्यटकों को गुफा तक पहुंचने के लिए 500 सीढियां उतरनी पड़ती हैं।
घूमने के लिए फुल पैकेज है कुंभलगढ़
कुंभलगढ़ अपने शानदार महलों के अतिरिक्त कई प्राचीन मंदिरों के लिए भी प्रसिद्ध है। उनमें से वेदी मंदिर, नीलकंठ महादेव मंदिर, मुच्छल महादेव मंदिर, परशुराम मंदिर, मम्मादेव मंदिर और रणकपुर जैन मंदिर इस पर्यटन स्थल के मुख्य पवित्र स्थल हैं।

4G के साथ सोनी ने लॉन्च किया Xperia E4g, कीमत 13,290 रुपए

सोनी ने अपने नए स्मार्टफोन Sony Xperia E4g को भारत में लॉन्च कर दिया है। सोनी का यह डुअल सिम फोन 4G नेटवर्क को सपोर्ट करता है। आपको बता दें कि कंपनी ने इस फोन को इसी साल बार्सिलोना में आयोजित मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस में पेश किया था। इस फोन की कीमत 13,290 रुपए रखी गई है।
सोनी Xperia E4g डुअल के फीचर्स-
Xperia E4g में 4.7 इंच का फुल HD क्वालिटी डिस्प्ले दिया गया है। फोन में 1GB रैम के साथ 1.5 GHz (MediaTek MT6732 chipset) क्वाड कोर प्रोसेसर दिया गया है। कंपनी ने इस स्मार्टफोन में 8 GB इंटरनल मेमोरी दी है जिसे माइक्रो एसडी कार्ड की मदद से 32GB तक बढ़ाया जा सकता है।
सोनी Xperia E4g डुअल के फीचर्स-
कैमरा फीचर की बात करें तो फोन में LED फ्लैश के साथ 5 मेगापिक्सल का रियर कैमरा दिया गया है। दूसरी तरफ 2 मेगापिक्सल का फ्रंट कैमरा दिया गया है। फ्रंट कैमरा से HD वीडियो रिकॉर्डिंग भी की जा सकती है। इसमें 4x डिजिटल जूम, ऑटो स्क्रीन रिकग्निशन और इमेज स्टैबलाइजर दिया गया है।
बता दें कि जब सभी स्मार्टफोन्स एंड्रॉइड के लेटेस्ट ऑपरेटिंग सिस्टम लॉलीपॉप के साथ लॉन्च किए जा रहे हैं ऐसे में अपने Xperia E4g स्मार्टफोन को कंपनी ने एंड्रॉइड 4.4 किटकैट ऑपरेटिंग सिस्टम के साथ लॉन्च किया है।
 बैटरी के बारे में बात करें तो इस फोन में 2300 mAh पावर की बैटरी दी गई है। कंपनी का कहना है कि यह फोन 2G पर 12 घंटे 10 मिनट का और 3G पर 12 घंटे 49 मिनट का टॉकटाइम देता है। यह 696 घंटे का स्टैंडबाय टाइम देता है।
कनेक्टिविटी की बात की जाए तो यह फोन 4G/LTE को सपोर्ट करता है। इसमें ब्लूटूथ और Wi-Fi का ऑप्शन भी दिया गया है।

अकबर की भी है अधूरी प्रेम कहानी, रानी को पाने के लिए किया था पति पर हमला

18 अप्रैल यानी आज 'वर्ल्ड हेरिटेज डे' है। इस मौके पर हम आपको उन धरोहरों के बारे में बता रहे है जिनके महत्व ने उनका नाम इतिहास में दर्ज करा दिया। भारत में ऐसे कई किले, उद्यान और जगहें हैं, जिन्हें विश्व विरासत में जगह मिली है। वहीं, कुछ ऐसे भी हैं जो इस लिस्ट में शामिल होने के लायक हैं। पत्नी मुमताज की याद व उनके प्रेम की खातिर मुगल सम्राट शाहजहां ने खूबसूरत ताज महल बनवाया था। ऐसे ही एक वीर योद्धा अकबर की अधूरी प्रेम कहानी के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं, जिन्हें मांडू की रानी रूपमती से प्रेम हो गया था। रानी को पाने के लिए अकबर ने एक साजिश के तहत उन्हें अपने पति से अलग करना चाहा था। मालवा के सारंगपुर जिले में बना एक मकबरा रानी रूपमती के प्रेम और बलिदान की मिसाल है। यह मकबरा मांडू की रानी रूपमती और बाज बहादुर को अलग करने की साजिश रचने वाले शहंशाह अकबर ने खुद बनवाया था।
रानी रूपमती की आवाज और खूबसूरती के कायल अकबर ने रानी को पाने के लिए सुल्तान बाज बहादुर पर न सिर्फ हमला करवाया था, बल्कि उन्हें बंदी भी बना लिया था। इस बात से दुखी रानी रूपमती ने हीरा गिलकर अपनी जान दे दी थी। रानी की मौत से दुखी अकबर ने फौरन बंधक बनाए प्रेमी बाज बहादुर को मुक्त कर दिया। इतना ही नहीं अकबर ने प्रेमिका की समाधि पर जान देने वाले बाज बहादुर का मकबरा भी बनवाया।
आशिक ए सादिक का मकबरा
सारंगपुर के नजदीक बना यह मकबरा शहंशाह अकबर ने 1568 ईस्वी में बनवाया था। यह बात सच है कि इस स्मारक को वह ख्याति नहीं मिल पाई, जिसका यह हकदार था। कभी अपनी भव्यता के लिए पहचाने जाने वाला यह मकबरा देखरेख के अभाव में अपने अस्तित्व को खोता जा रहा है। बताया जाता है कि दो प्रेमियों को अलग करने का पछतावा दिनरात अकबर को परेशान कर रहा था। ऐसे में अकबर ने बाज बहादुर के मकबरे  पर 'आशिक ए सादिक' और रानी रूपमति की समाधि पर 'शहीदे ए वफा' लिखवाया था। हालांकि वह शिलालेख अब वहां मौजूद नहीं है, लेकिन जानने वाले इसे इसी नाम से पुकारते हैं।
रूपमति से मिलने सारंगपुर आने लगे थे सुल्तान
उस समय सारंगपुर शेरशाह सूरी के सूबेदार सुजात खान के अधिकार में था। सुजात खान का संगीत व कला प्रेमी बेटा बाज बहादुर (1556 से 1561) तक मालवा का सुल्तान रहा। रूपमति सारंगपुर के पास फूलपुर (तिल्लजपुर) के एक किसान की बेटी थी। सुंदर होने के साथ ही रूपमति कवियित्री, गायिका व संगीतज्ञ थी। रूपमति की ख्याति सुनकर सुल्तान बाज उनसे मिलने सारंगपुर आए और उन्हें रूपमति से प्रेम हो गया। इसके बाद वह अक्सर रूपमती से मिलने सारंगपुर आया करते थे। कुछ महिनों बाद बाज बहादुर ने रूपमती से विवाह कर उसे अपनी रानी बना लिया।
दोनों के प्रेम को लगी शहंशाह की नजर
रानी रूपमती के सौंदर्य व गायन की चर्चा शहंशाह अकबर तक पहुंच चुकी थी। उन्होंने बाज बहादुर को पत्र लिखकर रानी रूपमती को दिल्ली दरबार में भेजने की बात कही। इस पर तमतमाए बाज बहादुर ने अकबर को उन्हीं के लहजे में पत्र लिखा और अपनी रानी को सारंगपुर भेजने की बात कही। एक राजा की इस गुस्ताखी ने शहंशाह अकबर को विचलित कर दिया।
रानी ने हीरा गिलकर दे दी थी जान
गुस्से में तमतमाए शहंशाह अकबर ने अपने सिपहसालार आदम खां को भेजकर मालवा पर आक्रमण करा दिया। लड़ाई में बाज बहादुर हार गया और मुगलों ने उसे बंदी बना लिया। जीत के बाद आदम खां रानी रूपमती को लेने के लिए मांडव रवाना हो गए। इससे पहले की अकबर रानी रूपमती को अपना बंदी बना पाता, रानी रूपमती ने हीरा गिलकर अपनी जान दे दी।
ताजमहल से पुरानी है सारंगपुर मकबरे की कहानी
इस प्रेम की अनोखी दास्तां के बारे में जानकर अकबर को बहुत पछतावा हुआ। दो प्रेमियों को अलग करने का जिम्मेदार खुद को मानने वाले अकबर के आदेश पर रानी रूपमती के शव को ससम्मान सारंगपुर भेजकर दफनाया गया। इतना ही नहीं अकबर ने रानी की मजार भी बनवाई।
रानी की मजार पर सिर पटक-पटक कर दे दी जान
पछतावे की आग में जल रहे अकबर ने तत्काल बंदी बाज बहादुर को मुक्त कराने के आदेश दे दिए। मुक्त होते ही बाज बहादुर को अकबर ने मिलने के लिए अपने दरबार में बुलाया। वर्ष 1568 में बाज बहादुर गंभीर बीमार हो गए थे। उन्होंने अकबर से अपनी अंतिम इच्छा जाहिर करते हुए सारंगपुर जाने की बात कही। इस पर अकबर ने बाज को दिल्ली से पालकी में बैठाकर सारंगपुर भिजवाया। यहां बाज बहादुर ने रूपमती की मजार पर सिर पटक-पटक कर जान दे दी। बाद में रूपमती के पास में ही बाज बहादुर की मजार भी बनाई गई।

B'DAY: एक्ट्रेस पूनम ढिल्लन शादी के बाद फिल्मों से रहीं दूर

बॉलीवुड की मशहूर एक्ट्रेस पूनम ढिल्लन 53 साल की हो गईं है। 18 अप्रैल 1962 को कानपुर में जन्मीं पूनम ने, 1977 में फेमिना मिस इंडिया का खिताब जीतकर सुर्खियां बटोरी थी। कहा जाता है कि पूनम का एक फोटो मैग्जीन में देखने के बाद, फिल्ममेकर यश चोपड़ा ने उन्हें फिल्म 'त्रिशूल' में काम करने का ऑफर दिया था। शुरुआत में उन्होंने इस ऑफर को ठुकरा दिया, लेकिन बाद में मूवी का हिस्सा बनने के लिए हामी भर दी। इस फैसले ने उनकी जिंदगी बदल दी और 'त्रिशूल' टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुई।
राजेश खन्ना के साथ सुपरहिट रही जोड़ी
सुपरहिट फिल्म 'त्रिशूल' से डेब्यू करने वाली एक्ट्रेस पूनम ढिल्लन की जोड़ी राजेश खन्ना के साथ खूब जमीं। दोनों ने निशान (1983), दर्द (1991), आवाम (1987), जय शिव शंकर (1990), रेड रोज (1980), जमाना (1985) जैसी फिल्मों में काम कर दर्शकोंं का दिल जीता।
शादी के बाद फिल्मों से रहीं दूर
1988 में पूनम ढिल्लन ने फिल्म प्रोड्यूसर अशोक ठाकरिया के साथ शादी कर ली थी। दोनों की मुलाकात एक कॉमन फ्रेंड के जरिए हुई थी। अशोक को पूनम से एक नजर में प्यार हो गया था। पूनम को अपने दिल का हाल बताने के बाद, अशोक उन्हें तब तक रोजाना फूल भेजते रहे, जबतक पूनम ने हां नहीं कर दी। अशोक से शादी करने के बाद पूनम ने फिल्मों में काम करना काफी हद कम कर दिया था। पूनम-अशोक के दो बच्चे भी है जिनका नाम अनमोल (बेटा) और पलोमा (बेटी) है। हालांकि, 1997 में अशोक और पूनम का डायवोर्स हो गया था। डायवोर्स के बाद अनमोल और पलोमा मां पूनम के साथ ही रहते हैं। बता दें, 22 वर्षीय अनमोल ठाकरिया यूएस में पढा़ई कर रहे हैं, वहीं 19 साल की पलोमा मुंबई के जमनाबाई स्कूल में अपना एजुकेशन पूरा कर रही हैं।
'जुदाई' से किया कमबैक
1992 में आई फिल्म 'विरोधी' के बाद पूनम ने लगभग पांच साल तक फिल्म इंडस्ट्री से ब्रेक ले लिया था। 1997 में रिलीज फिल्म 'जुदाई' से उन्होंने बॉलीवुड में कमबैक किया। 1995 में पूनम ने दर्शकों की पसंद को देखते हुए स्मॉल स्क्रीन का भी रूख किया और 'अंदाज', 'किटी पार्टी', 'बिग बॉस-3' का हिस्सा बनी। पूनम ढिल्लन सोनी टीवी पर प्रसारित हुए शो एक नई पहचान (2013-2014) में भी काम कर सुर्खियां बटोर चुकी हैं।

B'Anniv: ललिता पवार के ग्लैमरस करियर को एक थप्पड़ ने किया था बर्बाद


गुजरे जमाने की पॉपुलर एक्ट्रेस ललिता पवार यदि आज हमारे बीच होतीं तो पूरे 99 साल की हो गई होतीं। 18 अप्रैल 1916 को नासिक (बॉम्बे प्रेसिडेंसी, ब्रिटिश इंडिया) में जन्मी ललिता का 24 फरवरी 1998 को पुणे, महाराष्ट्र में निधन हो गया था। यूं तो ललिता ने कई फिल्मों और टीवी सीरियल्स में काम किया है, लेकिन आज भी वे घर-घर में 'रामायण' की मंथरा के नाम से जानी जाती हैं। जानते हैं उनकी जिंदगी की कुछ बातें:
18 रुपए/महीना था ललिता पवार का पहला वेतन
कम ही लोग जानते होंगे कि ललिता ने अपने करियर की शुरुआत तब कर दी थी, जब वे बच्ची थीं। एक इंटरव्यू के दौरान खुद ललिता पवार ने इस बात का जिक्र किया था। उन्होंने जो किस्सा सुनाया था, वह काफी रोचक हैं। ललिता के अनुसार, "मैं और मेरा भाई शांताराम पिता के साथ उनके किसी काम से पूना(अब पुणे)गए थे। इसी दौरान मैंने और शांताराम ने फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' देखी। यह पहला मौका था, जब मैंने कोई साइलेंट फिल्म देखी थी। मेरे लिए यह अनुभव किसी आश्चर्य से कम नहीं था। इससे पहले मैंने अपने गांव में होनेवाली रामलीला ही देखी थी। फिल्म खत्म होने के बाद मैंने पर्दे के पीछे जाकर देखा कि वे कौन लोग थे, जो अभिनय कर रहे थे, लेकिन वहां कोई नहीं मिला। इसके बाद मैं आर्यन सिनेमा के ऑपरेटर से मिली तो मैंने पूछा कि वो लोग कहां गए जो सामने अभिनय कर रहे थे। तब ऑपरेटर ने मुझे आर्यन फिल्म कंपनी के बारे में बताया, जो पार्वती हिल मंदिर, पुणे के करीब स्थित थी। मैं और शांताराम वहां पहुंचे। हमने कंपनी को ध्यान से देखा। यह काफी लंबे-लंबे पिलर्स से बना था और इसकी छत के लिए सफेद कपड़े का इस्तेमाल किया गया था। छत के नीचे एक हॉल था, जो कि कपड़े से ही बनाया गया था। खिडकियां, दरवाजे आदि को पेंट किया गया था और फर्नीचर भी व्यवस्थित रूप से जमा हुआ था। वहां शूटिंग भी चल रही थी। डायरेक्टर नानासाहेब सरपोतदार इस कंपनी के पार्टनर थे। जब उन्होंने हमें वहां देखा तो कहा कि यदि हम चाहें तो फिल्म में काम कर सकते हैं। इसके बाद उन्होंने हमारे पिता से बात की और वे तैयार हो गए। बस फिर क्या था मैंने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट 18 रुपए प्रति महीने में काम करना शुरू कर दिया और मेरे भाई को 7 रुपए के मासिक वेतन पर रखा गया। आर्यन फिल्म कंपनी के साथ मैंने 'आर्यन महिला', 'पतित उधार', 'राजा हरिश्चंद्र', 'भीमसेन', 'शमशेर बहादुर', 'पृथ्वीराज संयोगिता', 'सुभद्रा हरण' और 'चतुर सुंदरी' जैसी 20 फिल्मों में काम किया।"
'हिम्मत- ए-मर्दा' में दिखा ग्लैमरस अवतार
ललिता पवार ने 1935 तक साइलेंट फिल्मों में काम किया। यही वह साल था, जब वे पहली बार बोलती फिल्म में नजर आईं। यह फिल्म थी 'हिम्मत-ए-मर्दा'। फिल्म में ललिता का ग्लैमरस अवतार दर्शकों को देखने को मिला था। खास बात यह है कि इस फिल्म के सभी गाने भी खुद ललिता ने गाए थे। इसके बाद 1936 में उन्होंने खुद फिल्म प्रोड्यूस की। यह फिल्म थी 'दुनिया क्या है', जो टाल्सटॉय के रिसरेक्शन (पुनरुत्थान) नॉवेल पर आधारित थी। इस फिल्म को अपार सफलता मिली और ललिता की एक्टिंग को खूब सराहना मिली। इसके बाद वे ड्रामेटिक एक्ट्रेस के रूप में स्थापित हो गईं। इसके बाद ललिता ने 'नेताजी पालकर' और 'अमृत' जैसी कई फिल्मों में इमोशनल रोल किए।
एक थप्पड़ ने बर्बाद कर दिया करियर
ललिता पवार का करियर काफी अच्छा चल रहा था, लेकिन एक फिल्म के सेट पर को एक्टर भगवान दादा ने उन्हें ऐसा थप्पड़ मारा कि उनका करियर ही बर्बाद हो गया। घटना 1942 में रिलीज हुई फिल्म 'जंग-ए-आजादी' के शूटिंग के दौरान की है। एक इंटरव्यू के दौरान खुद ललिता ने इस घटना का जिक्र किया था। हालांकि, उन्होंने एक्टर और फिल्म का नाम इस समय उजागर नहीं किया था। उन्होंने कहा था, "मैं फिल्म की शूटिंग कर रही थी, जिसमें एक सीन के अनुसार, को-एक्टर को मुझे थप्पड़ मारना था। उस एक्टर को मुझसे गुरेज थी, इसलिए उसने इतनी जोर से थप्पड़ मारा कि मैं फर्श पर गिर पड़ी। मुझे फेशिअल पैरालिसिस हो गया। शॉट काफी अच्छे से हो गया, लेकिन मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। चार साल तक मेरा इलाज चला और मैं पूरी तरह काम से दूर रही। ये साल मेरे लिए काफी मुश्किल भरे थे। आज भी मेरे चेहरे में स्टिफनेस है। मैं जानती थी कि मेरा हीरोइन करियर खत्म हो गया, क्योंकि एक्ट्रेस के लिए सॉफ्ट फेस की जरूरत होती है। मैंने तय किया कि मुझे जो भी रोल मिलेंगे, मैं उसी में अपना बेस्ट देने की कोशिश करूंगी।" 1962 में ललिता फिल्म 'गृहस्थी' में नजर आईं, जो जुबली हिट साबित हुई। ललिता की मानें तो इस फिल्म के लिए उन्हें कई अवॉर्ड्स मिले थे। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था कि अपने पूरे करियर में उन्होंने 500 ऑड फिल्मों में काम किया है और सभी में अपना बेस्ट देने की कोशिश की है।

Friday, 17 April 2015

छुट्टियां प्लान कर रहे हैं, तो ये हैं INDIA के 10 BEST PLACES

हाथ में किताब, गरम चाय की प्याली और थोड़ी-सी सुस्ती, कुछ ऐसा ही सुखद एहसास होता है सर्दियों में। अगर इस सुस्ती को एक्साइटेड बनाया जाए तो कैसा हो! दोस्त, पार्टनर या फैमिली के साथ कहीं दूर घूमने निकला जाए तो कितना बढ़िया रहे, क्योंकि इससे बेहतर मौसम घूमने के लिए कोई और नहीं हो सकता। गर्मियों की तरह न तो इस मौसम में पसीने से तर होने की परेशानी और न ही बार-बार कपड़े बदलने की टेंशन। आज हम आपको भारत की उन खास जगहों के बारे में बता रहे हैं, जहां आप अपनी सर्दियां एन्जॉय कर सकते हैं। तो चलिए, देखते हैं कौन-सी है वो जगहें।
1-राजस्थान
सर्दियों में राजस्थान घूमने की बात ही कुछ और है। उत्तरी भारत की और जगहों की तरह ही राजस्थान में भी अच्छी ठंड का अनुभव होता है, पर यह ठंड दुनिया के पश्चिमी प्रदेशों के मुक़ाबले थोड़ी हल्की होती है। इस जगह की ख़ासियत है यहां के प्राचीन क़िले, जो यहां ‘गढ़’ के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। राजस्थान की विभिन्न जगहों की कला, सांस्कृतिक धरोहर और लोकनृत्य काफ़ी मनोहर हैं। ये दिलो-दिमाग़ में एक जादू-सा कर देते हैं। सर्दियों के मौसम में जोधपुर और जैसलमेर घूमने का अपना ही आनंद है। जैसलमेर में दूर तक फैला रेगिस्तान किसी को भी मंत्रमुग्ध कर सकता है।
2. केरल
कुछ लोगों को तसल्ली से कंबल में बैठकर अपनी सर्दियों की छुट्टियां बिताने में कोई दिलचस्पी नहीं होती। उन्हें मौसम के मिजाज़ का मज़ा लेने के लिए सैर-सपाटा पसंद होता है। ऐसे सैलानियों के लिए केरल से बेहतर कुछ नहीं है। भारत के इस ख़ूबसूरत प्रदेश का मौसम आम तौर पर सामान्य ही रहता है। यानी न सर्दी ना अधिक गर्मी। पूरे साल यहां काफ़ी संख्या में टूरिस्ट आते हैं। समुद्र के किनारे सैर-सपाटा करना, यहां के ट्री हाउस में आरामदायक समय गुज़ारना या फिर पानी में सैर, यहां के मुख्य आकर्षण हैं।
3. औली, उत्तराखंड
अगर आप शौकीन हैं स्कीइंग के, तो औली आपकी छुट्टियों के लिए एक बेहतरीन स्पॉट है। उत्तरी उत्तराखंड में स्थित इस जगह में कमाल के स्कीइंग स्पॉट्स हैं। ख़ासतौर पर पिछले कुछ समय से ये जगह स्कीइंग के लिए लोकप्रियता के मामले में शिमला-मनाली जैसी प्रसिद्ध जगहों को भी पीछे छोड़ चुकी है।
4. शिमला
शिमला का नाम हमेशा से ही भारत की सबसे ख़ूबसूरत जगहों में से एक रहा है। अगर आप अपने साथी या हमसफ़र के साथ बर्फ़ के बीचोंबीच यादगार पल बिताना चाहते हैं, तो आप शिमला ज़रूर आएं। यहां से बर्फ़ से ढकी चोटियां और बहुत ही मनोहारी प्राकृतिक छटा के कारण शिमला आज भी सैलानियों की पहली पसंद है। सर्दियों के महीनों में आप शिमला का आनंद अपने साथियों, दोस्तों, परिवार और यहां तक कि अकेले भी ले सकते हैं। ये स्कीइंग करने के लिहाज़ से भी कमाल की जगह है।
5. अंडमान
एक ऐसा होलिडे जो सुकून और शांति से भरा हो, आम तौर पर लोगों की ख़ास पसंद होता है। कुछ ऐसा ही अनुभव करना हो तो निकल जाइए अंडमान की सैर पर। अंडमान एक छोटा-सा द्वीप है। यह सैलानियों के लिए आकर्षण का बहुत बड़ा केंद्र है। ट्राइबल कल्चर को नजदीक से जानने के लिए इससे अच्छी जगह और कोई नहीं हो सकती। जाड़ों का समय इस जगह से समुद्री दुनिया को देखने का सबसे सही समय है।
6. दिल्ली
भारत की राजधानी दिल्ली सर्दियों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। यहां की भागदौड़ भरी जीवनचर्या के अलग हट कर, सर्दी के मौसम में दिल्ली का कुछ अलग ही रंग दिखता है। सुबह की धुंध, कोहरा और शाम की हाड़ कंपाने वाली शीतलहर का अनुभव दिल्ली में वाकई मज़ेदार होता है। सर्दी में दिल्ली की सबसे कमाल बात है यहां का खान-पान। अगर आप सर्दियों में दिल्ली आएं तो यहां के ज़ायकेदार व्यंजनों का ज़रूर मज़ा लें। जाड़े की ठंडी हवाओं के बीच ये खाना और भी लज़ीज लगता है।
7. नैनीताल
हिमालय की गोद में बसा नैनीताल समुद्र तल से तकरीबन 2000 मीटर की ऊंचाई पर है। इस ऊंचाई के कारण ही यहां का तापमान सालभर लगभग थोड़ा ठंडा ही रहता है। अगर आप बर्फ़ से ढकी चोटियां देखना चाहते हैं और सर्दियों का सुखद अनुभव करना चाहते हैं तो नैनीताल एक बेमिसाल जगह है। यहां की गलियों में भीड़ कम होती है और यहां का वातावरण अन्य पहाड़ी इलाक़ों की तरह ही प्यारा है।
8. गोवा
क्या आप कुछ ही पलों में बहुत सारे एडवेंचर्स करना पसंद करते हैं? अगर ऐसा है तो गोवा से अच्छी जगह आपके लिए नहीं हो सकती। भारत का सबसे छोटा प्रदेश होने के बावजूद, यहां मौज-मस्ती की कोई कमी नहीं है। सर्दियों के महीनों में, ख़ासकर नवंबर और दिसंबर में गोवा का माहौल देखने लायक होता है। यहां बीच पर मस्ती से भरे लोग दीवाना कर देने वाला माहौल बना देते हैं। क्रिसमस और न्यू ईयर सेलिब्रेट करने के लिए तो गोवा आना ही चाहिए। हालांकि, इस दौरन कई होटल गोवा में रुकने का आपसे अधिक दाम वसूलेंगे। इसलिए बेहतर होगा कि आप पहले से ही बुकिंग करवा कर चलें।
9. नेशनल जिम कॉर्बेट पार्क
नैनीताल में ही बसा एक प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान कॉरबेट नेशनल पार्क भारत का प्रसिद्ध जैविक उद्यान है। वैसे तो प्रकृति के अनुभव के लिए और बाघों की ख़ूबसूरती देखने के लिए यहां कभी भी आया जा सकता है, पर सर्दियों में यहां के वन्य जीवन को देखने का अलग ही मज़ा है। कोहरे से भरी सुबह में वन्य जीवों के दिखने की संभावना ज्यादा रहती है।
10. लक्षद्वीप
भारत के दक्षिणी-पश्चिमी छोर पर बसा लक्षद्वीप 39 छोटे-छोटे द्वीपों का समूह है। अंडमान की तरह ही यहां पर भी एक सुखद शांति का अहसास होता है। सर्दियों में अपना समय समुद्र तट पर बिताने के लिए और समुद्री जीवन को जानने के लिए सैलानी यहां आना पसंद करते हैं। यहां प्राकृतिक सुषमा का अनूठा अहसास मिलता है।

World Heritage Day:INDIA की 5 जगहें जहां दूर-दूर से आते हैं पर्यटक

भारत में ऐसे कई ऐसे मकबरे, मंदिर, पार्क और ऐतिहासिक स्थल हैं, जो विश्व धरोहर यानी वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल हैं। ये देश-विदेश के पर्यटकों के आकर्षण के केंद्र हैं। वर्ल्ड हेरिटेज डे के अवसर पर आज हम आपको भारत की उन जगहों के बारे में बताएंगे जो इस लिस्ट में शामिल हैं। इन जगहों पर सामान्य टूरिस्ट्स के साथ ही स्टूडेंट्स, रिसर्चर्स और स्कॉलर्स के अलावा धार्मिक वजहों से भी लोग आते हैं। हर साल यहां आने वाले टूरिस्ट्स की संख्या लाखों तक पहुंच जाती है।
1. ताज महल
भारत की नायाब धरोहरों में शामिल है आगरा का ताज महल। इसकी खूबसूरती को देखने दुनियाभर से लोग आते हैं। मुगल शासक शाहजहां द्वारा बेगम मुमताज की याद में बनावाया गया सफेद संगमरमर का यह मकबरा दुनिया के सात अजूबों में भी शामिल है। पत्थरों पर बारीकी से किया गया नक्काशी का काम इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाता है। आगरा ताज महल के लिए ही पूरी दुनिया में मशहूर है।
ताज महल की खास बातें
ताज महल की ऊंचाई 171 मीटर (561 फीट) है।
ताज महल को बनाने में 22,000 मजदूर, पेंटर, नक्काशीकार और कारीगर लगाए गए थे।
कहा जाता है मुगल शासक शाहजहां ताजमहल के सामने ही काले संगमरमर का एक और ताज महल बनवाना चाहता था। लेकिन बेटों के बीच चल रहे विवाद और आपसी मतभेदों की वजह से वह नहीं बन पाया।
ताज महल को एक ही दिन में तीन रंगों में देखा जा सकता है। सुबह यह हल्का गुलाबी, शाम को बिल्कुल सफेद और रात में चांद की रोशनी में गोल्डन रंग का दिखता है। कहते हैं कि इसके बदलते रंग का संबंध बादशाह की रानियों के बदलते मूड जैसा था।
शाहजहां की तीसरी बेगम मुमताज महल की याद में बनाए गए ताज महल को बनाने में पूरे 17 साल लगे थे।
बेगम के मरने का गम शाहजहां को इतना ज्यादा लगा था कि कुछ ही महीनों में उसके दाढ़ी-बाल बिल्कुल सफेद हो गए थे।
ताज महल की बनावट इस कदर है कि वो चारों तरफ से शीशे जैसा दिखाई देता है।
ताज महल चारों तरफ से सुंदर बाग-बगीचों, मस्जिदों से घिरा हुआ है।
लगभग 1000 हाथियों की भी जरूरत ताज महल को बनाने के वक्त पड़ी थी।
साल 1983 में ताजमहल वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल हुआ था।
साल 1905 में ब्रिटिश वायसराय लार्ड कर्जन की पत्नी के रिक्वेस्ट के बाद इसे बनाया गया। काजीरंगा नेशनल पार्क असम की एक बहुत ही बड़ी वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी है। यह खास तौर पर दरियाई घोड़ों के लिए जाना जाता है। इसके अलावा यह टाइगर, हाथी, सांभर, हिरन, भैंस, भालुओं सहित और भी कई प्रकार के पक्षियों के लिए भी फेमस है।
काजीरंगा नेशनल पार्क की खास बातें
असम का ये नेशनल पार्क बह्मपुत्र नदी के काफी करीब है।
मिकिर के पहाड़ों का नजारा भी इस नेशनल पार्क से आसानी से देखा जा सकता है।
पक्षियों की लगभग 100 प्रकार की प्रजातियों को इस नेशनल पार्क में देखा जा सकता है।
साथ ही यहां पाइथन, कोबरा और किंग कोबरा को देखने का अपना एक अलग ही रोमांच है।
साल 1985 में यूनेस्को ने काजीरंगा नेशनल पार्क को वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल किया था। 
बिहार के बोधगया में स्थित इसी मंदिर के पास पीपल के पेड़ के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। अब यहीं से बौद्ध भिक्षुओं की शिक्षा-दीक्षा की शुरुआत होती है। द्रविड़ आर्किटेक्चर के हिसाब से इस मंदिर का निर्माण किया गया है। इस मंदिर की ऊंचाई 180 फीट है।
महाबोधि मंदिर की खास बातें
बौद्धों के इस सबसे पुराने मंदिर को सिर्फ पत्थरों से बनाया गया था, लेकिन ये आज भी उतना ही मजबूत और खूबसूरत दिखता है।
45 मीटर स्क्वेयर में फैले इस मंदिर का आकार पिरामिड जैसा है।
मंदिर के पत्थरों पर महात्मा बुद्ध के जीवनकाल की घटनाओं को उकेर कर बताने की कोशिश की गई है।
साल 2002 में यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट में इस मंदिर को शामिल किया गया था। 
आगरा से महज 39 किमी की दूरी पर बसे फतेहपुर सीकरी की खूबसूरती का अंदाजा यहां आने के बाद ही पता चलता है। 1569 में अकबर द्वारा बनाए गए फतेहपुर सीकरी को 1571 से लेकर 1585 तक मुगलों की राजधानी के तौर पर जाना जाता था। लाल पत्थरों से बनी हुआ फतेहपुर सीकरी हिंदू और इस्लामिक आर्किटेक्चर का एक अनूठा उदाहरण है। पहले इस जगह का नाम फतेहाबाद था जिसे बाद में बदलकर फतेहपुर सीकरी कर दिया गया।
फतेहपुर सीकरी की खास बातें
फतेहपुर सीकरी को बनाने में पूरे 15 साल का वक्त लगा था।
घूमने के लिए यहां बुलंद दरवाजा, पंच महल, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, शेख सलीम चिश्ती का मकबरा और बीरबल भवन खास हैं।
फतेहपुर सीकरी वही जगह है जहां अकबर के नवरत्न रहा करते थे।
लगभग 14 सालों तक फतेहपुर सीकरी अकबर के राज्य की राजधानी के तौर पर जाना जाता था, लेकिन 1585 में पानी की कमी के चलते इसे बदल दिया गया था।
साल 1986 में इसे वर्ल्ड हेरिटेड साइट में जगह दी गई थी।
महाराष्ट्र के पहाड़ों को काटकर बनी इन गुफाओं को देखकर हर कोई दंग रह जाता है। इसमें बहुत सारे हिंदू देवी-देवताओं की झलकियां देखने को मिलती हैं। इनमें शिव-पार्वती प्रमुख हैं। भगवान शिव के तीनों रूपों की मूर्तियों यहां हैं। इसे घारापुरी के नाम से भी जाना जाता है, जो गेटवे ऑफ इंडिया से कुछ ही दूरी पर स्थित है।
एलिफेंटा गुफाओं की खास बातें
इस गुफा का आकार काफी हद तक हाथी से मिलता-जुलता था। यही कारण है कि पुर्तगालियों ने इसका नाम एलिफेंटा रखा।
गुफा के चारों ओर पत्थरों पर बारीकी से की हुई नक्काशी खासी आकर्षित करती है।
पांच अन्य गुफाएं इसके पश्चिम में स्थित हैं।
केनन हिल भी यहां की लोकप्रिय जगहों में शामिल है। लेकिन एलिफेंटा की गुफाएं आज भी ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है, जिसे देखने हर साल देश-विदेश से लोग आते हैं।
साल 1987 में एलिफेंटा की गुफाओं को वर्ल्ड हेरिटेज साइट की लिस्ट में शामिल किया गया था।