Monday, 30 March 2015

शहीद होने वाली देश की पहली महिला अफसर, जेठानी ने दिया गॉर्ड ऑफ ऑनर


नौसेना विमान हादसे में शहीद लेफ्टिनेंट किरण शेखावत का भी रविवार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। लेफ्टिनेंट किरण, मेवात के गांव कुर्थला की बहू थीं। रविवार को ही उनका शव यहां लाया गया था। उन्हें उनके जेठ ले.कमांडर बिक्रम सिंह राजपूत और जेठानी असि.कमांडेंट राजश्री राठौर ने गाॅर्ड ऑफ ऑनर दिया। किरण शहीद होने वाली देश की पहली महिला सैन्य अफसर हैं। वह राजस्थान के झुंझनू की रहने वाली थीं। उनके मायके और ससुराल में कई लोग सेना में सेवाएं दे रहे हैं। उनके पति विवेक छौक्कर भी नौसेना में लेफ्टिनेंट हैं।

B'Anniv: ये हैं बॉलीवुड की पहली एक्ट्रेस, ड्रैगन लेडी के नाम से थीं मशहूर

देविका रानी, दाईं ओर पंडित नेहरु के साथ (ऊपर), फिल्म 'कर्मा' में हिमांशु राय के साथ (नीचे)

भारतीय सिनेमा (बॉलीवुड) की पहली एक्ट्रेस देविका रानी यदि आज होतीं तो पूरी 107 साल की हो गई होतीं। उनका जन्म 30 मार्च 1908 में विशाखापत्तनम में हुआ था। देविका का शुरुआती जीवन यूके में बीता है, जहां उन्होंने बोर्डिंग स्कूल में रहकर पढ़ाई की। बता दें कि जिस तरह देविका बॉलीवुड की पहली एक्ट्रेस थीं, ठीक वैसे ही उनके पिता कर्नल मन्मथा नाथ चौधरी मद्रास प्रेसिडेंसी के पहले भारतीय सर्जन थे। बता दें कि सिगरेट और शराब के नशे की आदी होने और शॉर्ट टेम्पर होने के कारण देविका को ड्रैगन लेडी के नाम से भी जाना जाता था। जानते हैं उनके बारे में कुछ बातें:

फिल्मों में डेब्यू

देविका ने साल 1933 में हिमांशु राय के प्रोडक्शन में बनी फिल्म 'कर्मा' से फिल्मों में डेब्यू किया था। इस फिल्म में हिमांशु लीड एक्टर भी थे। 'कर्मा' किसी भारतीय द्वारा बनाई गई पहली अंग्रेजी टॉकी थी। इतना ही नहीं, यह पहली भारतीय फिल्म थी, जिसमें किसिंग सीन दिया गया था। दिलचस्प बात यह है कि हिमांशु राय और देविका रानी द्वारा दिए गए इस किसिंग सीन की टाइमिंग 4 मिनट थी, जो 82 साल बाद भी हिंदी सिनेमा में एक रिकॉर्ड है। बता दें कि हिमांशु से देविका की पहली मुलाकात 1928 में हुई थी। इसके बाद 1929 में देविका ने हिमांशु की शॉर्ट फिल्म 'अ थ्रो ऑफ डाइस' (1929) के लिए बतौर कॉस्टयूम डिजाइनर काम किया था।

हिमांशु राय से शादी

1929 में देविका रानी की हिमांशु राय से शादी हो गई थी। इसके बाद दोनों जर्मनी चले गए, जहां देविका बर्लिन के UFA स्टूडियो में फिल्म मेकिंग की बारीकियां सीख रही थीं। कर्मा की रिलीज के बाद हिमांशु ने बॉम्बे टॉकीज नाम से स्टूडियो स्थापित किया और 5-6 साल तक कई सुपरहिट फिल्में दीं। इनमें से कई फिल्मों में देविका ने बतौर लीड एक्ट्रेस काम किया। 1940 में हिमांशु राय के निधन के बाद देविका ने स्टूडियो की जिम्मेदारी अपने हाथों में ली। उन्होंने अशोक कुमार और शशधर मुखर्जी के साथ पार्टनरशिप में कई फिल्में प्रोड्यूस कीं। हालांकि, ये फिल्में सफल नहीं रहीं और देविका ने इंडस्ट्री को छोड़ने का फैसला ले लिया।


नेहरू परिवार से थे अच्छे संबंध

देविका और उनके दूसरे पति स्वेतोस्लाव के नेहरू परिवार से काफी अच्छे संबंध थे। दरअसल, 1945 में देविका रानी ने रूसी पेंटर स्वेतोस्लाव रोएरिच से दूसरी शादी की थी। शादी के बाद दोनों मनाली, हिमाचल प्रदेश चले गए। यहीं उनकी मुलाकात पंडित जवाहरलाल नेहरू और उनके परिवार से हुई। कहा जाता है कि नेहरूजी देविका के बहुत बड़े प्रशंसक थे। मनाली में कुछ साल बिताने के बाद देविका और उनके पति स्वेतोस्लाव बैंगलोर शिफ्ट हो गए और अपनी एक एक्सपोर्ट कंपनी खोल ली। 9 मार्च 1994 को भारतीय सिनेमा की यह पहली एक्ट्रेस दुनिया को अलविदा कह गई।

पहला दादा साहब फाल्के अवॉर्ड

1958 में भारत सरकार ने देविका रानी को पद्मश्री सम्मान दिया। इसके अलावा, भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान दादा साहब फाल्के सबसे पहले (1969 में) उन्हें ही मिला था। 1990 में देविका को सोवियत रूस ने 'सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड' से सम्मानित किया। फरवरी 2011 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा उनकी याद में एक डाक टिकट भी जारी किया था।

एक्टिंग के 10 साल

देविका ने 1933 में फिल्म 'कर्मा' के जरिए सिनेमा में एंट्री ली थी और 1943 में रिलीज हुई 'हमारी बात' बतौर एक्ट्रेस उनकी आखिरी फिल्म थी। 10 साल के करियर में 'जवानी की हवा' (1935), 'ममता और मियां बीवी' (1936), 'जीवन नैया' (1936), 'सावित्री' (1937), 'वचन' (1938) और 'अनजान' (1941) जैसी कई फिल्में की थीं।

पंडित मदन मोहन मालवीय को मरणोपरांत भारत रत्न

विख्‍यात स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षाविद् पंडित मदन मोहन मालवीय को आज राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में मरणोपरांत भारत रत्न से सम्‍मानित किया जाएगा। देश के स्वतंत्रता संग्राम और शिक्षा के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए श्री मालवीय के परिवार को यह पुरस्कार दिया जाएगा।

Saturday, 28 March 2015

40 साल के हुए 'हिमालय पुत्र' अक्षय खन्ना


फोटो में पिता विनोद खन्ना के बाएं तरफ अक्षय खन्ना,दाएं तरफ भाई राहुल खन्ना
बॉलीवुड एक्टर अक्षय खन्ना 40 साल के हो गए हैं। 28 मार्च 1975 को एक्टर विनोद खन्ना के यहां अक्षय का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी एक्टिंग के जरिए सिल्वर स्क्रीन पर गहरी छाप छोड़ी। जानते हैं अक्षय खन्ना के बारे में कुछ खास बातें-
अक्षय का फैमिली बैकग्राउण्ड
अक्षय खन्ना मशहूर वेटरन एक्टर और राजनेता विनोद खन्ना के दूसरे बेटे हैं। जबकि राहुल खन्ना अक्षय के बड़े भाई हैं। बता दें कि दोनों भाई विलिंगटन स्पोर्ट्स क्लब के मेंबर भी हैं।
फिल्मी सफर
नमित कपूर एक्टिंग इंस्टीट्यूट से कोर्स करने के बाद अक्षय खन्ना ने 1997 में फिल्म 'हिमालय पुत्र' से बॉलीवुड में डेब्यू किया। इस फिल्म का निर्माण उनके पिता विनोद खन्ना ने किया। हालांकि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा धमाल नहीं मचा सकी। इसके बाद 1997 में जेपी दत्ता की फिल्म 'बॉर्डर' आई,जिसमें अक्षय की एक्टिंग ने सभी का ध्यान खींचा। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्म फेयर बेस्ट डेब्यू के अवॉर्ड से नवाजा गया,साथ ही साथ बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के लिए उनका नॉमिनेशन भी हुआ। अक्षय खन्ना ने अपने फिल्मी सफर में अब तक ताल,दिल चाहता है,हलचल,रेस,हमराज और गांधी मॉय फादर जैसी कई उम्दा फिल्में दी।

सुंदरकांड का पाठ करने से मिलते हैं ये लाभ

अक्सर शुभ अवसरों पर गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड का पाठ किया जाता है। शुभ कार्यों की शुरुआत से पहले सुंदरकांड का पाठ करने का विशेष महत्व माना गया है। जब भी किसी व्यक्ति के जीवन में ज्यादा परेशानियां हों, कोई काम नहीं बन रहा हो, आत्मविश्वास की कमी हो या कोई और समस्या हो, सुंदरकांड के पाठ से शुभ फल प्राप्त होने लग जाते हैं। कई ज्योतिषी और संत भी विपरीत परिस्थितियों में सुंदरकांड का पाठ करने की सलाह देते हैं। यहां जानिए सुंदरकांड का पाठ विशेष रूप से क्यों किया जाता है?

सुंदरकांड के लाभ से मिलता है मनोवैज्ञानिक लाभ

वास्तव में श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड की कथा सबसे अलग है। संपूर्ण श्रीरामचरितमानस भगवान श्रीराम के गुणों और उनके पुरुषार्थ को दर्शाती है। सुंदरकांड एकमात्र ऐसा अध्याय है जो श्रीराम के भक्त हनुमान की विजय का कांड है। मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो यह आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला कांड है। सुंदरकांड के पाठ से व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। किसी भी कार्य को पूर्ण करने के लिए आत्मविश्वास मिलता है।
हनुमानजी जो कि वानर थे, वे समुद्र को लांघकर लंका पहुंच गए और वहां सीता की खोज की। लंका को जलाया और सीता का संदेश लेकर श्रीराम के पास लौट आए। यह एक भक्त की जीत का कांड है, जो अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इतना बड़ा चमत्कार कर सकता है। सुंदरकांड में जीवन की सफलता के महत्वपूर्ण सूत्र भी दिए गए हैं। इसलिए पूरी रामायण में सुंदरकांड को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ाता है। इसी वजह से सुंदरकांड का पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

सुंदरकांड के लाभ से मिलता है धार्मिक लाभ

हनुमानजी की पूजा सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली मानी गई है। बजरंग बली बहुत जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता हैं। शास्त्रों में इनकी कृपा पाने के कई उपाय बताए गए हैं, इन्हीं उपायों में से एक उपाय सुंदरकांड का पाठ करना है। सुंदरकांड के पाठ से हनुमानजी के साथ ही श्रीराम की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है। किसी भी प्रकार की परेशानी हो, सुंदरकांड के पाठ से दूर हो जाती है। यह एक श्रेष्ठ और सबसे सरल उपाय है। इसी वजह से काफी लोग सुंदरकांड का पाठ नियमित रूप करते हैं।
हनुमानजी के पूजन में ध्यान रखें ये सामान्य नियम
हर युग में श्रीराम के अनन्य भक्त बजरंग बली श्रद्धालुओं के दुखों को दूर करके उन्हें सुखी और समृद्धिशाली बनाते हैं। इसी कारण आज इनके भक्तों की संख्या काफी अधिक है। विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमानजी के मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगी रहती है। हनुमानजी के पूजन और दर्शन के लिए शास्त्रों के अनुसार कुछ नियम बताए गए हैं, पूजन और दर्शन करते समय इन नियमों का पालन चाहिए।
- हनुमानजी की तीन परिक्रमा करने का विधान है। भक्तों को इनकी तीन परिक्रमा ही करनी चाहिए।
- दोपहर के समय बजरंग बली को गुड़, घी, गेहूं के आटे से बनी रोटी का चूरमा अर्पित किया जा सकता है।
- हनुमानजी को शाम के समय फल जैसे आम, केले, अमरूद, सेवफल आदि का भोग लगाना चाहिए।
- सुंदरकांड का पाठ करते समय हनुमानजी को सिंदूर, चमेली का तेल और अन्य पूजन सामग्री भी अर्पित करना चाहिए।

चैत्र नवरात्रिः क्यों करते हैं कन्या पूजन? ये है महत्व व विधि

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार नवरात्रि में कन्या पूजन का विशेष महत्व है। अष्टमी व नवमी तिथि पर तीन से नौ वर्ष तक की कन्याओं का पूजन किए जाने की परंपरा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार तीन वर्ष से लेकर नौ वर्ष की कन्याएं साक्षात माता का स्वरूप मानी जाती हैं।
शास्त्रों के अनुसार एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य, दो की पूजा से भोग और मोक्ष, तीन की अर्चना से धर्म, अर्थ व काम, चार की पूजा से राज्य पद, पांच की पूजा से विद्या, छ: की पूजा से छ: प्रकार की सिद्धि, सात की पूजा से राज्य, आठ की पूजा से संपदा और नौ की पूजा से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है।
कन्या पूजन की विधि इस प्रकार है-
कन्या पूजन में तीन से लेकर नौ साल तक की कन्याओं का ही पूजन करना चाहिए इससे कम या ज्यादा उम्र वाली कन्याओं का पूजन वर्जित है। नवरात्रि की अष्टमी या नवमी तिथि पर कन्याओं को भोजन के लिए आमंत्रित करें। कन्याओं को आसन पर एक पंक्ति में बैठाएं। इसके बाद उन्हें रुचि के अनुसार भोजन कराएं। भोजन में मीठा अवश्य हो, इस बात का ध्यान रखें। भोजन के बाद कन्याओं के पैर धुलाकर विधिवत कुंकुम से तिलक करें। ऊं कौमार्यै नम: मंत्र से कन्याओं का पंचोपचार पूजन करें तथा दक्षिणा देकर हाथ में पुष्प लेकर यह प्रार्थना करें-
मंत्राक्षरमयीं लक्ष्मीं मातृणां रूपधारिणीम्।
नवदुर्गात्मिकां साक्षात् कन्यामावाहयाम्यहम्।।
जगत्पूज्ये जगद्वन्द्ये सर्वशक्तिस्वरुपिणि।
पूजां गृहाण कौमारि जगन्मातर्नमोस्तु ते।।
तब वह फूल कन्याओं के चरणों में अर्पण कर उन्हें ससम्मान विदा करें।

वास्तु टिप्स : दरवाजे के लिए उपाय, दूर होगी नकारात्मक ऊर्जा

वास्तु में घर के सभी हिस्सों के लिए टिप्स बताई गई हैं। ये टिप्स अपनाने पर घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। यहां जानिए घर के मुख्य दरवाजे के कुछ उपाय और वास्तु में बताई गई टिप्स...
दरवाजे के लिए उपाय
1. यदि घर का दरवाजा पूर्व दिशा में हो तो किसी भी सोमवार को एक रुद्राक्ष दरवाजे के मध्य में लटका दें। ऐसा करने पर कार्यों में सफलता मिलने की संभावनाएं काफी बढ़ जाती हैं।
2. दरवाजा पश्विम दिशा में हो तो रविवार को सूर्योदय से पहले दरवाजे के सामने नारियल के साथ कुछ सिक्के रखकर किसी लाल कपड़े में बांधें और दरवाजे कर लटका दें। सूर्य मंत्र का जप करें।
3. उत्तर दिशा का दरवाजा लाभदायक होता है। इस दिशा में दरवाजा हो तो भगवान विष्णु की आराधना करें। पीले फूले की माला बनाएं और दरवाजे पर लगाएं।
4. दक्षिण दिशा में दरवाजा शुभ नहीं माना जाता है। इस दिशा में दरवाजा हो तो बुधवार या गुरुवार को नींबू या सात कौड़ियां धागे में बांधकर दरवाजे पर लटका देना चाहिए।
5. मुख्य दरवाजे कोई पवित्र चिह्न लगाएं, जैसे ऊँ, श्रीगणेश, स्वस्तिक, शुभ-लाभ आदि। ऐसा करने पर घर पर सभी देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है और बुरी नजर से घर की रक्षा होती है।
6. मुख्य द्वार का मुख पूर्व या दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर है तो दरवाजे के अंदर बाएं ओर जल पात्र को पानी और फूल की पंखुड़ियों से भरकर रखें। इससे दिशा को सकारात्मक रुख देने में मदद मिलेगी। वैसे वास्तु के हिसाब से पूर्व दिशा पवित्र समझी जाती है।
7. उत्तर दिशा के दरवाजे के लिए सफेद, पेल ब्लू कलर बेहतर होते हैं।
8. मुख्य दरवाजा पश्चिम दिशा की ओर मुख वाला हो तो सूर्यास्त के वक्त दुष्प्रभावों को रोकने के लिए द्वार के समीप ग्लास क्रिस्टल रखें।
9. यदि आपके घर का दरवाजा दक्षिण दिशा की ओर है तो आप इसे गहरे महरून, पेल यलो या वर्मिलियन रेड के शेड से रंग सकते है। इन सभी कलर शेड के कलर बाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।
10. मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर दिशा की ओर है तो छह छड़ वाली धातु की बनी विंड चाइम लगानी चाहिए। विंड चाइम की खनखनाहट से मुख्य दरवाजे के आसपास के बुरे प्रभाव दूर हो सकते हैं। यहां बताए जा रहे वास्तु के सभी आइटम्स बाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।
11. पश्चिम की ओर मुख वाले दरवाजे के लिए प्लॉट या यहां तक कि बालकनी के उत्तर-पूर्व क्षेत्र में तुलसी का पौधा नकारात्मक प्रभावों को भी सकारात्मकता प्रदान कर सकता है। इसी तरह चमेली की बेल भी सुगंध से प्रतिकूल प्रभावों को दूर करने का काम करती है।
12. दरवाजों के दोनों ओर काफी सारे हरे और लम्बे स्वस्थ पौधे लगाए जा सकते हैं जो गलत दिशा में बने दरवाजे के दुष्प्रभावों को दूर करने का काम करेंगे।