Wednesday, 1 April 2015

श्रीकृष्ण की वो बातें, जिनसे बदलने लगी थी अर्जुन की सोच

श्री मद्भागवत गीता के पहले और दूसरे अध्याय में अभी तक हमने जाना कि अर्जुन ने दुखी होकर धनुष-बाण त्याग दिए है। उन्हें ये भी भान नहीं रहा की शंखध्वनि के साथ ही युद्ध शुरू हो चुका है। और कौरवों के लिए अब निहत्थे अर्जुन को मारना आसान हो गया है। श्रीकृष्ण ने जब यह देखा तो अपनी माया के प्रभाव से समय को रोक दिया। अब श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच में होने वाली बातचीत को न तो कौरव देख सकते थे और न पांडव। इसे केवल एक ही इंसान देख सकते थे। वो थे संजय जो कि विदुर के पुत्र थे। विदुर हस्तिनापुर की दासी के बेटे थे। जिन्हें आगे जाकर धृतराष्ट्र और पांडव के बाद तीसरे पुत्र के रूप में होने का अधिकार मिला था। इस तरह संजय पांडव और कौरवों के भाई हुए। धृतराष्ट्र अंधे थे, इसलिए युद्ध नहीं कर सकते थे। तब संजय को दिव्य दृष्टि मिली थी कि वो युद्ध को देख सकेंगे और सारा हाल धृतराष्ट्र को बतला सकेंगे। तब श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच में होने वाली बातों को संजय ने धृतराष्ट्र को बतलाया।
संजय ने देखा कि दुखी अर्जुन को श्रीकृष्ण समझा रहे हैं कि युद्ध करो। लेकिन अर्जुन को इस युद्ध में अपनी भलाई नजर नहीं आ रही है। उनके अनुसार अपने अपनों को मारने से और उनके बगैर जिंदगी को बिताने से तो अच्छा है कि राजमहल का सुख छोड़कर और राजा बनने का विचार त्यागकर भीख मांगकर ही गुजारा कर लिया जाए। श्रीकृष्ण ने देखा कि अर्जुन के मन में घोर निराशा थी। जिसे दूर करना कोई साधारण बात नहीं थी। क्योंकि जो अर्जुन सोच रहे थे। मनुष्य जीवन में जीते हुए प्रत्येक इंसान यही सोचता है। अब समय आ गया था कि अर्जुन को आत्मा का ज्ञान दिया जाए। वो ज्ञान जो साधारण व्यक्ति के हृदय को प्रकाशवान कर सकता है। आत्मा का यह ज्ञान किसी चमत्कार से कम नहीं।
श्री कृष्ण ने कहा- हे अर्जुन! ये जो सुख और दुख हैं, ये सर्दी और गर्मी की ही तरह केवल थोड़े समय के लिए होते हैं। सुख और दुख को महसूस करने वाली ये जो स्थिति बनी है, जो कि हमारी इंद्रियों को तड़पाती है। हमें दुख में दुखी करती है और सुख में सुखी करती है। उन पलों को, केवल उन पलों को सहन करो।
क्योंकि जिसने सुख और दुख को एक समान समझ लिया, ऐसे मनुष्य को कोई भी परिस्थिति दुखी नहीं कर पाएगी।
हे अर्जुन! जैसे झूठ कभी हो ही नहीं सकता, क्योंकि झूठ कभी हुआ ही नहीं है। उसी प्रकार सच कभी मिट नहीं सकता है, क्योंकि जो सच है वो घटित हुआ है। उसी प्रकार ये जो शरीर है, इसे रहना नहीं है, क्योंकि ये तो बना ही मिटने के लिए है। और ये जो आत्मा है, ये बनी है हमेशा रहने के लिए। इसलिए आत्मा का ये शरीर है,ये नष्ट होने वाला ही है। इसलिए तू युद्ध कर।
श्री कृष्ण आगे कहते हैं- हे अर्जुन! इस आत्मा को जो मरा मानता है या ये आत्मा भी मर जाएगी। जो भी इंसान ऐसा मान लेता है। वो ये नहीं जानता है कि आत्मा न तो मरती है। और नाही मारी जाती है। ये आत्मा न तो सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और नाही कलयुग में कभी जन्म लेगी। और नाही कभी किसी भी युग में मरेगी।
इस आत्मा का कभी भी जन्म नहीं हुआ है। ये तो बिना जन्मीं है। ये तब से है, जब से ब्रह्मांड है। ये होने के लिए है।
जो भी इस आत्मा नित्य और अजन्मा मान लेता है। वह न तो किसी को मार सकता है और ना ही किसी को मरवा सकता है। अब यदि तुम ये कहते हो कि मैं तो शरीर के मरने का ही दुख कर रहा हूं। तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं है अर्जुन। क्योंकि जिस प्रकार से हम पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करते हैं। उसी प्रकार ये आत्मा भी पुराने शरीरों को त्यागकर नया शरीरों को धारण करती रहती हैं।
इस आत्मा के विषय में ये भी समझ लो अर्जुन कि -
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं केल्दयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।

इस आत्मा को कोई शस्त्र नहीं काट सकता है और आग भी इसको जला नहीं सकती है। जल इसको गीला नहीं कर सकता है और वायु भी इसको सुखा नहीं सकती है। क्योंकि यह आत्मा बिना देह की, बिना शुरुआत वाली, बिना अंत की है। यह सनातन है और स्थिर रहने वाला है। कहीं भी और कभी भी उपस्थित हो जाने की शक्ति इस आत्मा के पास है। इस आत्मा के रंग-रूप में कभी कोई बदलाव आने वाला नहीं है।

यदि कोई बार-बार अपमान करता तो क्या करना चाहिए?

जिस तेजी से हम सफलता अर्जित कर रहे हैं, उसी गति से हमारी बुराई करने वालों की संख्या भी बढ़ती है। बुराई करने वाले लोग हमारी प्रतिष्ठा पर बुरा असर डालते हैं, वे लगातार हमारा अपमान करने का प्रयास करते रहते हैं। इनसे बचने के लिए सबसे अच्छा तरीका यही है कि अपने काम से उन्हें गलत साबित करें। साथ ही, ऐसे लोगों को अधिक महत्व नहीं देना चाहिए और इन्हें पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं करना चाहिए। महाभारत में श्रीकृष्ण और शिशुपाल के प्रसंग से हम सीख सकते हैं कि यदि कोई हमारा अपमान करता है तो क्या करना चाहिए...
शिशुपाल की सौ गलतियां श्रीकृष्ण ने की थी माफ
महाभारत में शिशुपाल और श्रीकृष्ण का प्रसंग काफी चर्चित रहा है। शिशुपाल श्रीकृष्ण की बुआ का पुत्र था और चेदी नगर का राजा था। श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की माता को वचन दिया था कि वे शिशुपाल की 100 गलतियां माफ करेंगे, लेकिन 100 गलतियों के बाद उसे उचित सजा भी अवश्य देंगे।
ये है शिशुपाल और श्रीकृष्ण का प्रसंग
विदर्भराज के रुक्मी, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेस तथा रुक्ममाली नामक पांच पुत्र और एक पुत्री रुक्मिणी थी। रुक्मिणी के माता-पिता उसका विवाह श्रीकृष्ण के साथ करना चाहते थे, लेकिन रुक्मी (रुक्मिणी का बड़ा भाई) चाहता था कि उसकी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ हो। अतः उसने रुक्मिणी का टीका शिशुपाल के यहां भिजवा दिया। रुक्मिणी श्रीकृष्ण से प्रेम करती थी, इसलिए उसने श्रीकृष्ण को एक ब्राह्मण के हाथों संदेशा भेजा। श्रीकृष्ण भी रुक्मिणी से प्रेम करते थे और वे ये भी जानते थे कि रुक्मिणी के माता-पिता रुक्मिणी का विवाह मुझसे ही करना चाहते हैं, लेकिन बड़ा भाई रुक्मी मुझसे शत्रुता के कारण ये विवाह नहीं होने देना चाहता है। श्रीकृष्ण ने रुक्मी के विरोध के बावजूद रुक्मिणी से विवाह किया। इस विवाह को चेदिराज शिशुपाल ने अपना अपमान समझा और वह श्रीकृष्ण को शत्रु समझने लगा।
कुछ समय बाद जब युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ आयोजित किया। इस आयोजन में सभी प्रमुख राजाओं को आमंत्रित किया गया। चेदिराज शिशुपाल भी यज्ञ में आया था। देवपूजा के समय श्रीकृष्ण का सम्मान देखकर शिशुपाल क्रोधित हो गया और उसने श्रीकृष्ण को अपशब्द कहना शुरू कर दिए। यज्ञ में उपस्थित सभी लोगों ने शिशुपाल को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना। अर्जुन और भीम शिशुपाल को मारने के लिए खड़े हो गए तो श्रीकृष्ण ने उन सभी को रोक दिया। शिशुपाल लगातार गालियां देता रहा और श्रीकृष्ण गालियां गिनते रहे। जब वह सौ अपशब्द कह चुका, तब श्रीकृष्ण ने उसे अंतिम चेतावनी दी कि अब रुक जाओ, अन्यथा परिणाम अच्छा नहीं होगा। श्रीकृष्ण के समझाने के बाद भी शिशुपाल नहीं रुका और उसने फिर से अपशब्द कहा। इसके बाद शिशुपाल के मुख से अपशब्द निकलते ही श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका मस्तक काट दिया।
इस प्रसंग से हम यह सीख ले सकते हैं कि यदि कोई हमारा अपमान करता है तो पहले उसे समझाने के पूरे प्रयास करना चाहिए। यदि लगातार समझाने के बाद भी व्यक्ति हमारे मान-सम्मान को ठेस पहुंचा रहा है तो उसे उचित जवाब देना चाहिए। ऐसे लोगों को चुप करने के लिए हमें लगातार श्रेष्ठ काम करना चाहिए और उसकी बातों को गलत साबित करना चाहिए।

हनुमान जयंतीः इस गांव में नहीं होती पवनपुत्र की पूजा

उत्तराखंड का द्रोणागिरि गांव
चैत्र मास की पूर्णिमा को हनुमान जयंती का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 4 अप्रैल, शनिवार को है। हनुमान जयंती के अवसर हम आपको उस पर्वत के बारे में बता रहे हैं, जिसे हनुमानजी संजीवनी बूटी के लिए उठाकर ले गए थे। मान्यता है कि वह पर्वत उत्तराखंड के द्रोणागिरि नामक स्थान पर स्थित था। द्रोणागिरि के लोग आज भी हनुमानजी की पूजा इसलिए नहीं करते क्योंकि हनुमानजी उस स्थान से पर्वत उठाकर ले गए थे।
यहां वर्जित है हनुमानजी की पूजा करना
द्रोणागिरि गांव उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ प्रखण्ड में जोशीमठ नीति मार्ग पर है। यह गांव लगभग 14000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां के लोगों का मानना है कि हनुमानजी जिस पर्वत को संजीवनी बूटी के लिए उठाकर ले गए थे, वह यहीं स्थित था।
चूंकि द्रोणागिरि के लोग उस पर्वत की पूजा करते थे, इसलिए वे हनुमानजी द्वारा पर्वत उठा ले जाने से नाराज हो गए। यही कारण है कि आज भी यहां हनुमानजी की पूजा नहीं होती। यहां तक कि इस गांव में लाल रंग का झंडा लगाने पर भी पाबंदी है।
यहां स्थित है संजीवनी बूटी वाला पर्वत
श्रीलंका के सुदूर इलाके में श्रीपद नाम का एक पहाड़ है। मान्यता है कि यह वही पर्वत है, जिसे हनुमानजी संजीवनी बूटी के लिए उठाकर लंका ले गए थे। इस पर्वत को एडम्स पीक भी कहते हैं। यह पर्वत लगभग 2200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। श्रीलंकाई लोग इसे रहुमाशाला कांडा कहते हैं। इस पहाड़ पर एक मंदिर भी बना है।
हनुमानजी लंका से उठा लाए थे सुषेण वैद्य को
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के अनुसार रावण के पुत्र मेघनाद व लक्ष्मण के बीच जब भयंकर युद्ध हो रहा था, उस समय मेघनाद ने वीरघातिनी शक्ति चलाकर लक्ष्मण को बेहोश कर दिया। हनुमानजी उसी अवस्था में लक्ष्मण को लेकर श्रीराम के पास आए। लक्ष्मण को इस अवस्था में देखकर श्रीराम बहुत दु:खी हुए।
तब जांबवान ने हनुमानजी से कहा कि लंका में सुषेण वैद्य रहता है, तुम उसे यहां ले आओ। हनुमानजी ने ऐसा ही किया। सुषेण वैद्य ने हनुमानजी को उस पर्वत और औषधि का नाम बताया और हनुमानजी से उसे लाने के लिए कहा, जिससे कि लक्ष्मण पुन: स्वस्थ हो जाएं। हनुमानजी तुरंत उस औषधि को लाने चल पड़े। जब रावण को यह बात पता चली तो उसने हनुमानजी को रोकने के लिए कालनेमि दैत्य को भेजा।
कालनेमि दैत्य ने रूप बदलकर हनुमानजी को रोकने का प्रयास किया, लेकिन हनुमानजी उसे पहचान गए और उसका वध कर दिया। इसके बाद हनुमानजी तुरंत औषधि वाले पर्वत पर पहुंच गए, लेकिन औषधि पहचान न पाने के कारण उन्होंने पूरा पर्वत ही उठा लिया और आकाश मार्ग से उड़ चले। अयोध्या के ऊपर से गुजरते समय भरत को लगा कि कोई राक्षस पहाड़ उठा कर ले जा रहा है। यह सोचकर उन्होंने हनुमानजी पर बाण चला दिया।
हनुमानजी श्रीराम का नाम लेते हुए नीचे आ गिरे। हनुमानजी के मुख से पूरी बात जानकर भरत को बहुत दु:ख हुआ। इसके बाद हनुमानजी पुन: श्रीराम के पास आने के लिए उड़ चले। कुछ ही देर में हनुमान श्रीराम के पास आ गए। उन्हें देखते ही वानरों में हर्ष छा गया। सुषेण वैद्य ने औषधि पहचान कर तुरंत लक्ष्मण का उपचार किया, जिससे वे पुन: स्वस्थ हो गए।
67 करोड़ वानर घायल हो गए थे एक बाण से
वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण के पुत्र मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र चलाकर श्रीराम व लक्ष्मण सहित समूची वानर सेना को घायल कर दिया। अत्यधिक घायल होने के कारण जब श्रीराम व लक्ष्मण बेहोश हो गए तो मेघनाद प्रसन्न होकर वहां से चला गया। उस ब्रह्मास्त्र ने दिन के चार भाग व्यतीत होते-होते 67 करोड़ वानरों को घायल कर दिया था।
हनुमानजी, विभीषण आदि कुछ अन्य वीर ही उस ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से बच पाए थे। जब हनुमानजी घायल जांबवान के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा- इस समय केवल तुम ही श्रीराम-लक्ष्मण और वानर सेना की रक्षा कर सकते हो। तुम शीघ्र ही हिमालय पर्वत पर जाओ और वहां से औषधियां लेकर आओ, जिससे कि श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना पुन: स्वस्थ हो जाएं।
जांबवान ने हनुमानजी से कहा कि- हिमालय पहुंचकर तुम्हें ऋषभ तथा कैलाश पर्वत दिखाई देंगे। उन दोनों के बीच में औषधियों का एक पर्वत है, जो बहुत चमकीला है। वहां तुम्हें चार औषधियां दिखाई देंगी, जिससे सभी दिशाएं प्रकाशित रहती हैं। उनके नाम मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी है।
हनुमान तुम तुरंत उन औषधियों को लेकर आओ, जिससे कि श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना पुन: स्वस्थ हो जाएं। जांबवान की बात सुनकर हनुमानजी तुरंत आकाश मार्ग से औषधियां लेने उड़ चले। कुछ ही समय में हनुमानजी हिमालय पर्वत पर जा पहुंचे। वहां उन्होंने हनुमानजी ने अनेक महान ऋषियों के आश्रम देखे।
हिमालय पहुंचकर हनुमानजी ने कैलाश तथा ऋषभ पर्वत के दर्शन भी किए। इसके बाद उनकी दृष्टि उस पर्वत पर पड़ी, जिस पर अनेक औषधियां चमक रही थीं। हनुमानजी उस पर्वत पर चढ़ गए और औषधियों की खोज करने लगे। उस पर्वत पर निवास करने वाली संपूर्ण महाऔषधियां यह जानकर कि कोई हमें लेने आया है, तत्काल अदृश्य हो गईं। यह देखकर हनुमानजी बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने वह पूरा पर्वत ही उखाड़ लिया, जिस पर औषधियां थीं।
कुछ ही समय में हनुमान उस स्थान पर पहुंच गए, जहां श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना बेहोश थी। हनुमानजी को देखकर श्रीराम की सेना में पुन: उत्साह का संचार हो गया। इसके बाद उन औषधियों की सुगंध से श्रीराम-लक्ष्मण व घायल वानर सेना पुन: स्वस्थ हो गई। उनके शरीर से बाण निकल गए और घाव भी भर गए। इसके बाद हनुमानजी उस पर्वत को पुन: वहीं रख आए, जहां से लेकर आए थे।  
मान्यता है कि यह वही पर्वत है, जिसे हनुमानजी संजीवनी बूटि के लिए उठाकर श्रीलंका लेकर आए थे। इस पर्वत को एडम्स पीक भी कहते हैं।

गुड फ्राइडे 3 कोः क्या आप जानते हैं, क्यों खास है ये दिन

गुड फ्राइडे प्रभु यीशु के निर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है। सही मायनों में यह प्रभु यीशु द्वारा मानवता के लिए प्राण का न्यौछावर करने का दिन है। इस बार गुड फ्राइडे 3 अप्रैल, शुक्रवार को है।
धर्म ग्रंथों के अनुसार यीशु मसीह का जन्म इजराइल के एक गांव बेतलेहम में हुआ था। बालक यीशु को बेतलेहम के राजा हेरोदेस ने मरवाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो पाया। जब यीशु बड़े हुए तो जगह-जगह जाकर लोगों को मानवता और शांति का संदेश देने लगे। उन्होंने धर्म के नाम पर अंधविश्वास फैलाने वाले लोगों को मानव जाति का शत्रु कहा। उनके संदेशों से परेशान होकर धर्म पंडितों ने उन्हें धर्म की अवमानना का आरोप लगाकर उन्हें मौत की सजा दी।
यीशु को कई तरह की यातनाएं दी गयीं। यीशु के सिर पर कांटों का ताज रखा गया। इसके बाद यीशु क्रूस(सलीब) को अपने कंधे पर उठाकर गोल गोथा नामक जगह ले गए। जहां उन्हें सलीब पर चढ़ा दिया गया। जिस दिन यीशु को सूली पर चढ़ाया गया, वह शुक्रवार का दिन था। तीन घंटे बाद यीशु ने ऊंची आवाज में परमेश्वर को पुकारा- हे पिता मैं अपनी आत्मा को तेरे हाथों सौंपता हूं। इतना कहकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
मानवता के लिए बलिदान का वो दिन गुड फ्राइडे के रूप में मनाया जाता है। ईसाई धर्म के अनुयायी यीशु को उनके त्याग के लिए याद करते हैं। इसके बाद यीशु को कब्र में दफना दिया गया, लेकिन ईश्वरीय कृपा से तीन दिन बाद यानी रविवार को यीशु पुन: जीवित हो उठे। कहते हैं पुन: जीवित होने के बाद यीशु चालीस दिन तक अपने शिष्यों और मित्रों के साथ रहे और अंत में स्वर्ग चले गए।

प्रायश्चित व प्रार्थना करने का दिन है गुड फ्राइडे

प्रभु ईसा मसीह मानवता के रक्षक थे। उन्होंने ईश्वर के मार्ग पर चलते-चलते अपने प्राणों का त्याग कर दिया। ईसा मसीह के बलिदान की याद में ईसाई समुदाय के लोग पवित्र सप्ताह मनाते हैं। ईसाई धर्म ग्रंथों के अनुसार जिस दिन ईशु ने प्राण त्यागे थे, उस दिन शुक्रवार था। इसी की याद में गुड फ्राइडे मनाया जाता है। इस घटना के तीन दिन बाद ईशु पुन: जीवित हो गए थे, इस दिन को ईस्टर सण्डे कहते हैं।
गुड फ्राइडे को होली फ्राइडे, ब्लैक फ्राइडे या ग्रेट फ्राइडे भी कहते हैं। गुड फ्राइडे के दिन ईसाई धर्म के लोग गिरिजाघर जाकर प्रभु यीशु को याद करते हैं। जिस सलीब (क्रॉस) पर ईसा मसीह को लटकाया गया था, उसके प्रतीक रूप में लकड़ी का एक तख्ता गिरजाघरों में रखा जाता है। ईशु के भक्त एक-एक कर आकर उसे चूमते हैं। इसके बाद दोपहर से तीन बजे तक सर्विस की जाती है।
सर्विस में ईसाई सिद्धांतों (चार गोस्पेल्स) में से किसी एक का पठन किया जाता है। तत्पश्चात समारोह में प्रवचन, ध्यान और प्रार्थनाएं की जाती हैं। इस दौरान श्रद्धालु प्रभु यीशु द्वारा तीन घंटे तक क्रॉस पर भोगी गई पीड़ा को याद करते हैं। इसके बाद आधी रात को सामान्य कम्यूनियन सर्विस होती है। चूंकि गुड फ्राइडे प्रायश्चित और प्रार्थना का दिन है, अत: इस दिन गिरजाघरों में घंटियां (बेल) नहीं बजाई जातीं।

महावीर जयंती कलः इन्होंने दिया था दया और अहिंसा का संदेश

जैन धर्म के अनुसार वर्धमान महावीर जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान श्री आदिनाथ की परंपरा में चौबीस वें तीर्थंकर हुए थे। वर्धमान महावीर का जन्मदिवस जैन अनुयायियों द्वारा प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इस बार महावीर जयंती का पर्व 2 अप्रैल, गुरुवार को है।
जैन धर्म के अनुसार भगवान महावीर का जन्म वैशाली के एक क्षत्रिय परिवार में राजकुमार के रूप में चैत्र शुक्ल पक्ष त्रयोदशी को हुआ था। इनके बचपन का नाम वर्धमान था। यह लिच्छवी कुल के राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के पुत्र थे। जैन धर्मावलंबियों का मानना है कि वर्धमान जी ने घोर तपस्या द्वारा अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली थी, जिस कारण उनको महावीर कहा गया और उनके अनुयायी जैन कहलाए।
महावीर जयंती के अवसर पर जैन धर्मावलंबी प्रात: काल प्रभातफेरी निकालते हैं तथा भव्य जुलूस के साथ पालकी यात्रा का आयोजन किया जाता है। इसके बाद महावीर स्वामी का अभिषेक किया जाता है तथा शिखरों पर ध्वजा चढ़ाई जाती है। महावीर जी ने अपने उपदेशों द्वारा समाज का कल्याण किया। उनकी शिक्षाओं में मुख्य बातें थी कि सत्य का पालन करो, प्राणियों पर दया करो, अहिंसा को अपनाओ, जियो और जीने दो। इसके अतिरिक्त उन्होंने पांच महाव्रत, पांच अणुव्रत, पांच समिति तथा छ: आवश्यक नियमों का विस्तार पूर्वक उल्लेख किया, जो जैन धर्म के प्रमुख आधार हुए।

मानव जाति को ये संदेश दिए थे महावीर स्वामी ने

मानव जीवन को सरल और महान बनाने के लिए महावीर स्वामी ने कई अमूल्य शिक्षाएं दी हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
अहिंसा: संसार में जो भी जीव निवास करते हैं उनकी हिंसा नहीं और ऐसा होने से रोकना ही अहिंसा है। सभी प्राणियों पर दया का भाव रखना और उनकी रक्षा करना।
अपरिग्रह: जो मनुष्य सांसारिक भौतिक वस्तुओं का संग्रह करता है और दूसरों को भी संग्रह की प्रेरणा देता है वह सदैव दुखों में फंसा रहता है। उसे कभी दुखों से छुटकारा नहीं मिल सकता।
ब्रह्मचर्य: ब्रह्मचर्य ही तपस्या का सर्वोत्तम मार्ग है। जो मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन कठोरता से करते हैं, स्त्रियों के वश में नहीं हैं उन्हें मोक्ष अवश्य प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य ही नियम, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, संयम और विनय की जड़ है।
क्षमा: क्षमा के संबंध में महावीर कहते हैं 'संसार के सभी प्राणियों से मेरी मैत्री है वैर किसी से नहीं है। मैं हृदय से धर्म का आचरण करता हूं। मैं सभी प्राणियों से जाने-अनजाने में किए अपराधों के लिए क्षमा मांगता हूं और उसी तरह सभी जीवों से मेरे प्रति जो अपराध हो गए हैं उनके लिए मैं उन्हें क्षमा प्रदान करता हूं।
अस्तेय: जो पराई वस्तुओं पर बुरी नजर रखता हैं वह कभी सुख प्राप्त नहीं कर सकता। अत: दूसरों की वस्तुओं पर नजर नहीं रखनी चाहिए।
दया: जिसके हृदय में दया नहीं उसे मनुष्य का जीवन व्यर्थ हैं। हमें सभी प्राणियों के दयाभाव रखना चाहिए। आप अहिंसा का पालन करना चाहते हैं तो आपके मन में दया होनी चाहिए।
छुआछूत: सभी मनुष्य एक समान है। कोई बड़ा-छोटा और छूत-अछूत नहीं हैं। सभी के अंदर एक ही परमात्मा निवास करता है। सभी आत्मा एक सी ही है।
हिताहार और मिताहार: खाना स्वाद के लिए नहीं, अपितु स्वास्थ्य के लिए होना चाहिए। खाना उतना ही खाए जितना जीवित रहने के लिए पर्याप्त हो। खान-पान में अनियमितता हमारे स्वास्थ्य के खिलवाड़ है जिससे हम रोगी हो सकते हैं।

पति या पत्नी गलती करते हैं तो ध्यान रखें ये चाणक्य नीति

आमतौर पर यही माना जाता है कि जो व्यक्ति गलत काम करता है, उसी व्यक्ति को ऐसे काम का बुरा फल भी भोगना पड़ता है। ये बात सही है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में गलत काम करने वाले व्यक्ति के साथ ही दूसरों को भी ये फल प्राप्त होते हैं। आचार्य चाणक्य ने एक नीति में बताया है कि किन हालातों में हमें दूसरों की वजह से परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि...
राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञ: पापं पुरोहित:।
भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्यपापं गुरुस्तथा।।
चाणक्य ने इस श्लोक में बताया है कि किस व्यक्ति के पाप का फल किसे भोगना पड़ता है।
यदि जीवन साथी गलत काम करता है तो
आचार्य कहते हैं कि विवाह के बाद यदि कोई पत्नी गलत कार्य करती है, ससुराल में सभी का ध्यान नहीं रखती है, अपने कर्तव्यों का पालन ठीक से नहीं करती है तो ऐसे कार्यों की सजा पति को ही भुगतना पड़ती है। ठीक इसी प्रकार यदि कोई पति गलत काम करता है तो उसका बुरा फल पत्नी को भी भोगना पड़ता है। अत: पति और पत्नी, दोनों को एक-दूसरे का अच्छा सलाहकार होना चाहिए। जीवन साथी को गलत काम करने से रोकना चाहिए।
राजा के गलत काम के जिम्मेदार होते हैं पुरोहित, मंत्री और सलाहकार
जब शासन में मंत्री, पुरोहित या सलाहकार अपने कर्तव्यों को ठीक से पूरा नहीं करते हैं और राजा को सही-गलत कार्यों की जानकारी नहीं देते हैं, उचित सुझाव नहीं देते हैं तो राजा के गलत कार्यों के जवाबदार पुरोहित, सलाहकार और मंत्री ही होते हैं। पुरोहित का कर्तव्य है कि वह राजा को सही सलाह दें और गलत काम करने से रोकें।
तब राजा होता है जिम्मेदार
यदि किसी राज्य या देश की जनता कोई गलत काम करती है तो उसका फल शासन को या उस देश के राजा को ही भोगना पड़ता है। अत: यह राजा या शासन की जिम्मेदारी होती है कि प्रजा या जनता कोई गलत काम न करें।
जब राजा अपने राज्य का पालन सही ढंग से नहीं करता है, अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं करता है, तब राज्य की जनता विरोधी हो जाती है और वह गलत कार्यों की ओर बढ़ जाती है। ऐसी परिस्थितियों में राजा ही जनता द्वारा किए गए गलत कार्यों का जवाबदार होता है। यही बात किसी संस्थान पर या किसी भी टीम पर भी लागू हो सकती है। टीम के सदस्य या संस्थान के कर्मचारी गलत काम करते हैं तो टीम के लीडर या संस्थान के मालिक को भी बुरा फल प्राप्त होता है।
शिष्य के गलत काम का फल गुरु को
इस नीति के अंत में चाणक्य ने बताया है कि जब कोई शिष्य गलत कार्यों में लिप्त हो जाता है तो उसका बुरा फल गुरु को ही भोगना पड़ता है। गुरु का कर्तव्य होता है कि वह शिष्य को गलत रास्ते पर जाने से रोकें, सही कार्य करने के लिए प्रेरित करें। यदि गुरु ऐसा नहीं करता है और शिष्य रास्ता भटक कर गलत कार्य करने लगता है तो उसका दोष गुरु को ही लगता है।

Xiaomi ने लॉन्च किया अपना सबसे सस्ता 4G फोन

श्याओमी कंपनी ने अपनी फिफ्थ एनिवर्सरी में आज अपना सबसे सस्ता फोन लॉन्च किया है। चीन में हुए एक इवेंट में ये फोन लॉन्च किया गया है। चीनी स्मार्टफोन मेकर ने अपने Mi Note का नया एडिशन (पिंक वर्जन) भी लॉन्च किया है। श्याओमी के CEO ली जुन (Lei Jun) ने इस इवेंट में दो और प्रोडक्ट्स लॉन्च किए। आज श्याओमी कंपनी की पांचवी एनिवर्सरी पर ये डिवाइसेस लॉन्च किए गए हैं।
Xiaomi Redmi 2A की कीमत-
श्याओमी के इस सबसे सस्ते स्मार्टफोन की कीमत 599 चीनी युआन (लगभग 6000 रुपए) है और ये 499 चीनी युआन (लगभग 5000 रुपए) के स्पेशल प्राइस पर 8 अप्रैल को बिकेगा। भारत में इसकी कीमत क्या होगी और कब तक ये भारत में लॉन्च होगा इसकी कोई जानकारी अभी तक नहीं दी गई है। 
Xiaomi Redmi 2A
श्याओमी के इस 4G स्मार्टफोन में 1.5 GHz का क्वाड-कोर प्रोसेसर दिया गया है। इस बार प्रोसेसर क्वालकॉम कंपनी की जगह लीडकोर कंपनी का लगाया गया है। इस फोन के बाकी सभी फीचर्स रेडमी 2 जैसे ही हैं जिसे हाल ही में 6999 रुपए की कीमत में भारत में लॉन्च किया गया है।
1GB रैम के साथ श्याओमी रेडमी 2A में 4.7 इंच की IPS डिस्प्ले स्क्रीन दी गई है। इसके अलावा, 8GB की इंटरनल मेमोरी है। इस फोन में 8 मेगापिक्सल के रियर कैमरा के साथ 2 मेगापिक्सल का फ्रंट कैमरा दिया गया है। इसके अलावा, इस फोन में 2200 mAh की बैटरी दी गई है जिसके टॉकटाइम और स्टैंडबाय टाइम की डिटेल्स अभी नहीं मिली हैं।
कंपनी ने रेडमी 2A की सभी स्पेसिफिकेशन्स अभी डिटेल नहीं की हैं। इस फोन की पहली बिक्री चीन में 8 अप्रैल को की जाएगी।